कपिल सिब्बल, अरविंद केजरीवाल, रिटायर्ड जस्टिस ए.एस. ओका, लाइव लॉ और द हिंदू के खिलाफ विस्फोटक संवैधानिक शिकायत.
लंबित न्यायिक कार्यवाही को प्रभावित करने और ‘इकोसिस्टम’ के खिलाफ आदेश देने वाले जजों को निशाना बनाने की साजिश का आरोप”
शिकायत में कपिल सिब्बल, मीनाक्षी अरोड़ा, संजय हेगड़े, विवेक तन्खा, कलीश्वरम राज, लाइव लॉ और द हिंदू के खिलाफ आपराधिक मुकदमा, अवमानना कार्रवाई, वकालत का लाइसेंस रद्द करने और सीनियर एडवोकेट की पदवी वापस लेने की मांग
न्यायपालिका पर दबाव बनाने, नैरेटिव मैनेजमेंट और संगठित न्यायिक हस्तक्षेप के सह-षड्यंत्रकारी होने का आरोप
अभियुक्तों के विरुद्ध भारतीय दंड संहिता की धारा 192, 193, 120-B, 107, 109, 34 तथा अन्य लागू प्रावधानों (और उनके समकक्ष भारतीय न्याय संहिता प्रावधानों) के अंतर्गत अभियोजन चलाने की मांग की गई है। साथ ही Contempt of Courts Act, 1971 की धारा 2(b), 2(c), 12 सहपठित धारा 15 के अंतर्गत आपराधिक एवं सिविल अवमानना कार्यवाही प्रारंभ करने की भी प्रार्थना की गई है। शिकायत में लगाए गए अपराधों के लिए अधिकतम सात वर्ष तक के कारावास, जुर्माना, न्यायालय अवमानना की सजा, वकालत का लाइसेंस/सनद रद्द करने तथा सीनियर एडवोकेट की “उपाधि” वापस लेने जैसी कठोर कार्रवाई का प्रावधान है।
यह शिकायत इंडियन लॉयर्स एंड ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्ट्स एसोसिएशन ने दायर की है।
भारत के माननीय राष्ट्रपति के समक्ष दायर एक विस्तृत और विस्फोटक संवैधानिक शिकायत में देश के कई प्रभावशाली राजनीतिक नेताओं, सीनियर एडवोकेट्स, रिटायर्ड न्यायाधीशों, डिजिटल लीगल पोर्टलों और मीडिया संस्थानों पर गंभीर आरोप लगाए गए हैं। शिकायत में दावा किया गया है कि दिल्ली हाईकोर्ट में लंबित रिक्यूजल विवाद को प्रभावित करने और उसके बाद रिक्यूजल आवेदन खारिज होने पर संबंधित न्यायाधीश को सार्वजनिक रूप से बदनाम करने के लिए एक सुनियोजित, संगठित और बहु-स्तरीय कानूनी-मीडिया अभियान चलाया गया।
शिकायत में मुख्य रूप से अरविंद केजरीवाल, सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल, रिटायर्ड जस्टिस ए.एस. ओका, मीनाक्षी अरोड़ा, संजय हेगड़े, विवेक तन्खा, एडवोकेट कलीश्वरम राज, लीगल पोर्टल “Live Law” और राष्ट्रीय समाचारपत्र “The Hindu” सहित उनके संपादकीय बोर्ड, मालिकों, प्रबंधन और संबंधित व्यक्तियों को आरोपी बनाया गया है।
शिकायत के अनुसार यह केवल किसी न्यायिक आदेश की आलोचना का मामला नहीं है, बल्कि “महत्वपूर्ण तथ्यों को दबाकर, रिकॉर्ड को तोड़-मरोड़कर, चुनिंदा तथ्य प्रस्तुत करके और बौद्धिक बेईमानी के माध्यम से जनता के सामने एक झूठा और भ्रामक नैरेटिव तैयार करने” का मामला है। शिकायत में कहा गया है कि इस पूरी मुहिम का उद्देश्य न्यायपालिका पर दबाव बनाना, लंबित न्यायिक कार्यवाही को प्रभावित करना और न्यायमूर्ति स्वर्णा कांता शर्मा की निष्पक्षता पर जनता में संदेह पैदा करना था।
“रिक्यूजल थ्योरी” केवल प्रतिकूल आदेश आने के बाद सक्रिय हुई?
शिकायत का सबसे महत्वपूर्ण आरोप यह है कि “परसीव्ड बायस” और “कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट” का सिद्धांत केवल चुनिंदा तरीके से लागू किया गया। शिकायत में कहा गया है कि अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद (ABAP) के कार्यक्रमों में शामिल होने वाले कई न्यायाधीश पहले भी अरविंद केजरीवाल से जुड़े मामलों की सुनवाई कर चुके हैं और उन्हें राहत तथा जमानत तक दे चुके हैं, लेकिन तब कभी किसी ने रिक्यूजल की मांग नहीं उठाई।
शिकायत का दावा है कि यही तथ्य पूरी “रिक्यूजल नैरेटिव” को ध्वस्त कर देता है। यदि ऐसे कार्यक्रमों में शामिल होना वास्तव में पक्षपात का आधार होता, तो सभी न्यायाधीशों के खिलाफ समान आपत्ति उठाई जानी चाहिए थी। लेकिन ऐसा केवल तब किया गया जब आदेश कथित “इकोसिस्टम” के खिलाफ गया। शिकायत के अनुसार इससे “डबल स्टैंडर्ड, चयनात्मक नैतिकता और राजनीतिक सुविधा के लिए इस्तेमाल की गई रिक्यूजल थ्योरी” उजागर होती है।
दीपक गुप्ता–रोहिंटन नरीमन विवाद पर ‘इकोसिस्टम’ की चुप्पी
शिकायत में विशेष रूप से आरोप लगाया गया है कि वही लोग और मीडिया प्लेटफॉर्म, जो आज जस्टिस स्वर्णा कांता शर्मा के खिलाफ “परसीव्ड बायस”, “कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट” और “न्यायिक निष्पक्षता” जैसे सिद्धांतों का आक्रामक रूप से सहारा ले रहे हैं, उन्होंने कभी भी जस्टिस (रिटायर्ड) रोहिंटन फली नरीमन या जस्टिस (रिटायर्ड) दीपक गुप्ता के संदर्भ में ऐसे सिद्धांतों को लागू नहीं किया। शिकायत में In Re Vijay Kurle, In re, (2021) 13 SCC 616 मामले का विशेष उल्लेख करते हुए कहा गया है कि उस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने यह कहा था कि “पिता और पुत्र अलग-अलग कानूनी इकाइयाँ हैं” और केवल पारिवारिक संबंध मात्र से किसी न्यायाधीश के विरुद्ध स्वतः कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट या पक्षपात का अनुमान नहीं लगाया जा सकता।
शिकायत के अनुसार उस मामले में जस्टिस आर.एफ. नरीमन द्वारा ऐसे मामलों की सुनवाई की गई थी जिनमें उनके पिता श्री फली एस. नरीमन, सीनियर एडवोकेट, के विरुद्ध सार्वजनिक आलोचना और आरोपों का संदर्भ मौजूद था। इसके बावजूद न तो कथित “इकोसिस्टम” ने किसी प्रकार का मीडिया ट्रायल चलाया, न कोई डिजिटल अभियान चलाया गया, न ही न्यायिक निष्पक्षता पर सार्वजनिक प्रश्न उठाए गए। शिकायत का दावा है कि यही लोग अब जस्टिस स्वर्णा कांता शर्मा के खिलाफ कहीं अधिक कमजोर और अप्रत्यक्ष आधारों पर “परसीव्ड बायस” का सिद्धांत लागू कर रहे हैं।
शिकायत में आगे आरोप लगाया गया है कि Vijay Kurle का उक्त निर्णय कथित रूप से “per incuriam” था तथा बाद में तीन-न्यायाधीशीय पीठ के फैसले Krishnadatt Awasthy v. State of M.P. द्वारा Overruled – निष्प्रभावी हो गया। इसके बावजूद न तो Live Law, न The Hindu, न कपिल सिब्बल और न ही कथित “इकोसिस्टम” से जुड़े अन्य प्रभावशाली व्यक्तियों ने कभी उस फैसले, संबंधित न्यायाधीशों या उस कानूनी सिद्धांत के विरुद्ध कोई सार्वजनिक अभियान चलाया। इससे यह स्पष्ट होता है कि पूरा विवाद सिद्धांतों, न्यायिक नैतिकता या निष्पक्षता पर आधारित नहीं था, बल्कि यह केवल इस बात पर निर्भर था कि न्यायालय का आदेश “इकोसिस्टम” के पक्ष में है या उसके विरुद्ध।
कपिल सिब्बल का चैनल, रिटायर्ड जज और “नेटवर्क आधारित समन्वय”
शिकायत में आरोप लगाया गया है कि जस्टिस (रिटायर्ड) ए.एस. ओका और जस्टिस (रिटायर्ड) दीपक गुप्ता कई बार कपिल सिब्बल के यूट्यूब चैनल “#DilSeWithKapilSibal” पर दिखाई दिए। बाद में यही मंच दिल्ली हाईकोर्ट के रिक्यूजल विवाद पर चर्चा और नैरेटिव तैयार करने का प्रमुख माध्यम बना। शिकायत के अनुसार यह “व्यक्तिगत निकटता, वैचारिक समन्वय और नेटवर्क आधारित अभियान” का संकेत है।
लाइव लॉ पर एकतरफा और विकृत रिपोर्टिंग के आरोप
शिकायत में लीगल पोर्टल “Live Law” पर भी गंभीर आरोप लगाए गए हैं। शिकायत के अनुसार लाइव लॉ ने कई मामलों में अदालत की कार्यवाही को “चुनिंदा, अधूरी, विकृत और वैचारिक रूप से फ़िल्टर” करके प्रकाशित किया। शिकायत में दावा किया गया है कि लाइव लॉ के खिलाफ पहले भी कई कानूनी नोटिस, अवमानना कार्यवाही और हर्जाना दावे शुरू किए जा चुके हैं।
विशेष रूप से 15.04.2026 को प्रकाशित लाइव लॉ लेख —
“Wouldn’t Have Attended Adhivakta Parishad’s Program As A Sitting Judge As It’s Politically Inclined : Justice A.S. Oka”
— को शिकायत में “रणनीतिक रूप से समयबद्ध हस्तक्षेप” बताया गया है, क्योंकि यह दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा रिक्यूजल आवेदन खारिज किए जाने से मात्र पाँच दिन पहले प्रकाशित हुआ था। शिकायत का दावा है कि इसके बाद द हिंदू का संपादकीय, अरविंद केजरीवाल का सार्वजनिक पत्र और कपिल सिब्बल का यूट्यूब कार्यक्रम एक “संगठित मल्टी-प्लेटफॉर्म नैरेटिव ऑपरेशन” का हिस्सा थे।
“न्यायपालिका को संदेश” — अनुकूल आदेश दो या सार्वजनिक हमले झेलो
शिकायत का सबसे गंभीर आरोप यह है कि यह पूरा अभियान केवल एक न्यायाधीश को निशाना बनाने तक सीमित नहीं था, बल्कि पूरे देश की न्यायपालिका को संदेश देने के लिए चलाया गया:
“यदि किसी राजनीतिक रूप से प्रभावशाली व्यक्ति या इकोसिस्टम के खिलाफ आदेश दोगे, तो तुम्हें मीडिया हमलों, डिजिटल ट्रायल और सार्वजनिक बदनामी का सामना करना पड़ेगा।”
शिकायत के अनुसार यह न्यायिक स्वतंत्रता और संवैधानिक शासन के लिए सीधा खतरा है।
कानून स्पष्ट है: षड्यंत्र को बढ़ावा देने वाले सभी लोग समान रूप से अपराधी
शिकायत में विस्तार से कहा गया है कि भारतीय दंड संहिता की धारा 120-B, 107, 34 तथा भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 10 के तहत जो भी व्यक्ति किसी आपराधिक षड्यंत्र को बढ़ावा देता है, उसके लिए झूठा नैरेटिव फैलाता है, या अपराध को छिपाने में मदद करता है, वह मुख्य आरोपी के समान ही उत्तरदायी होता है।
शिकायत के अनुसार इस मामले में मुख्य अपराध IPC की धारा 192 और 193 के अंतर्गत “झूठे साक्ष्य तैयार करना” और “न्यायिक कार्यवाही से संबंधित झूठे व भ्रामक नैरेटिव तैयार करना” है। शिकायत में कहा गया है कि जो भी वकील, मीडिया संस्था, डिजिटल प्लेटफॉर्म या सार्वजनिक व्यक्ति इस कथित अभियान में शामिल था, वह कानूनन समान रूप से जिम्मेदार है।
इसके समर्थन में शिकायत में Shyni Varghese v. State (Govt. of NCT of Delhi), 2008 SCC OnLine Del 204; CBI v. Bhupendra Champaklal Dalal, 2019 SCC OnLine Bom 140; Raman Lal v. State of Rajasthan, 2000 SCC OnLine Raj 226; Pratapbhai Hamirbhai Solanki v. State of Gujarat, (2013) 1 SCC 613; और Bhupinder Singh Patel v. CBI, 2008 SCC OnLine Del 711 जैसे निर्णयों का हवाला दिया गया है।
“यह केवल आपराधिक साजिश नहीं, बल्कि क्रिमिनल कंटेम्प्ट भी है”
शिकायत में यह भी कहा गया है कि लंबित न्यायिक कार्यवाही को प्रभावित करने, अदालत की गरिमा कम करने और जनता के मन में न्यायपालिका के प्रति अविश्वास पैदा करने वाली ऐसी प्रकाशित सामग्री Contempt of Courts Act, 1971 की धारा 2(c) और 12 के तहत आपराधिक अवमानना भी है। इसके लिए Nilesh Navalakha v. Union of India, 2021 SCC OnLine Bom 56 का विशेष उल्लेख किया गया है, जिसमें बॉम्बे हाईकोर्ट ने लंबित मामलों की जिम्मेदार रिपोर्टिंग के सिद्धांतों को दोहराया था।
शिकायत में अंततः मांग की गई है कि सभी आरोपियों के खिलाफ आपराधिक मुकदमा दर्ज किया जाए, अवमानना कार्रवाई शुरू की जाए, सीनियर एडवोकेट की पदवी वापस ली जाए, वकालत का लाइसेंस रद्द किया जाए, और पूरे मामले की स्वतंत्र जांच कराई जाए।