संविधान की जीत, न्याय व्यवस्था में ऐतिहासिक बदलाव सुप्रीम कोर्ट के आदेशों पर आधारित नेशनल ज्यूडिशियल पॉलिसी चेकलिस्ट जारी
आम आदमी को मिलेगा न्याय, अन्यायी अधिकारी जाएंगे जेल, न्याय में मनमानी समाप्त — नौकरशाही से लेकर न्यायपालिका तक जवाबदेही तय
विभागीय कार्रवाई, निलंबन या बर्खास्तगी से लेकर फौजदारी कार्रवाई तक कानूनी प्रक्रिया सुनिश्चित करने वाला बाध्यकारी कानून।
– इंडियन बार एसोसिएशन ने सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की हर केस के लिए चेकलिस्ट जारी की
इससे सबसे अधिक लाभ जूनियर वकीलों और आम आदमी को होगा, क्योंकि अब हर मामले में कानून के अनुसार सभी को समान न्याय देना अनिवार्य होगा।
इसके अतिरिक्त, कानून का पालन न करने वाले सभी अधिकारियों—यहाँ तक कि न्यायाधीशों—के विरुद्ध भी कार्रवाई का प्रावधान किया गया है, तथा सुप्रीम कोर्ट के बाध्यकारी आदेशों के अनुपालन हेतु एक विस्तृत चेकलिस्ट तैयार की गई है, जिससे प्रत्येक प्रकरण में न्यायिक प्रक्रिया की पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित हो सकेगी।
भारतीय संविधान और सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्थापित कानून के अनुसार, सभी सार्वजनिक प्राधिकरणों, पुलिस अधिकारियों और न्यायालयों का यह कर्तव्य है कि वे सही और स्थापित कानून को स्वतः लागू करें और उसका लाभ आम आदमी तक पहुँचाएँ। यदि कोई व्यक्ति कानून से अनभिज्ञ है, तो उसके अधिकारों की रक्षा करने की जिम्मेदारी लोकसेवकों, पुलिस अधिकारियों, सरकारी अधिवक्ताओं तथा न्यायाधीशों पर निहित है, ताकि किसी भी नागरिक के संवैधानिक और वैधानिक अधिकारों का हनन न हो।
नई दिल्ली: इंडियन बार एसोसिएशन (IBA) ने सुप्रीम कोर्ट के बाध्यकारी आदेशों और भारतीय संविधान के सिद्धांतों पर आधारित एक “एकीकृत न्यायिक चेकलिस्ट” जारी की है। यह चेकलिस्ट न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता, समानता और जवाबदेही सुनिश्चित करने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम मानी जा रही है।
चेकलिस्ट यह सुनिश्चित करती है कि यदि किसी व्यक्ति को किसी मामले में राज्य या किसी अन्य पक्ष के विरुद्ध न्यायिक घोषणा (Legal Declaration) प्राप्त होती है, तो उसी प्रकार की परिस्थितियों वाले सभी नागरिकों को उसका लाभ स्वतः (suo motu) दिया जाएगा, ताकि बार-बार मुकदमेबाजी से बचा जा सके। इससे न केवल कानून के समक्ष समानता सुनिश्चित होगी, बल्कि न्यायालयों और वादकारियों पर अनावश्यक बोझ भी कम होगा। इस पहल से सबसे अधिक लाभ जूनियर वकीलों और आम आदमी को होगा, क्योंकि अब प्रत्येक मामले में कानून के अनुसार सभी को समान न्याय देना अनिवार्य होगा।
भारतीय संविधान और सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्थापित कानून के अनुसार, सभी सार्वजनिक प्राधिकरणों, पुलिस अधिकारियों और न्यायालयों का यह कर्तव्य है कि वे सही और स्थापित कानून को स्वतः लागू करें, ।
कानून की अज्ञानता कोई बहाना नहीं है। प्रत्येक अधिकारी और प्रत्येक न्यायाधीश यह सत्यापित करने के लिए बाध्य है कि उनके द्वारा पारित किया जाने वाला आदेश सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्थापित बाध्यकारी कानून के विरुद्ध न हो।
कानून का पालन न करने पर सख्त परिणाम
चेकलिस्ट के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की अवहेलना करने पर निम्नलिखित कठोर परिणाम होंगे—
- अदालत की अवमानना: अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 2(b) एवं 12 के अंतर्गत
- आपराधिक दायित्व: भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धाराएँ 198, 201, 255, 257, 258 आदि (पूर्ववर्ती IPC की धाराएँ 166, 167, 217, 219, 220)
- विभागीय कार्रवाई: निलंबन, पदावनति अथवा सेवा से बर्खास्तगी
चेकलिस्ट के प्रमुख उद्देश्य
- मूलभूत अधिकारों की सुरक्षा: अब किसी भी नागरिक के अधिकारों का उल्लंघन अनजाने में भी नहीं हो सकेगा।
- भ्रष्टाचार पर नकेल: सरकारी अधिकारियों और न्यायालयों के मनमाने या अन्यायपूर्ण निर्णयों पर कठोर कार्रवाई सुनिश्चित होगी।
- जवाबदेही का कानून में समावेश: अधिकारी और न्यायाधीश अपनी शक्तियों का प्रयोग केवल संविधान और सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के अनुरूप ही कर सकेंगे।
- समान न्याय की गारंटी: समान परिस्थितियों में सभी को निर्णय का लाभ मिलेगा, जिससे बार-बार मुकदमे दायर करने की आवश्यकता समाप्त होगी।
इंडियन बार एसोसिएशन का कहना है कि यह एकीकृत न्यायिक चेकलिस्ट न केवल न्याय को आम आदमी के दरवाज़े तक पहुँचाएगी, बल्कि न्यायपालिका और समस्त सार्वजनिक प्राधिकरणों में जवाबदेही, पारदर्शिता और संवैधानिक अनुशासन को भी सुदृढ़ करेगी।
इस चेकलिस्ट में सुप्रीम कोर्ट के लगभग 200 विभिन्न आदेशों, दिशानिर्देशों और बाध्यकारी कानूनी प्रावधानों का समग्र और व्यवस्थित संकलन किया गया है, जिनका पालन प्रत्येक मामले में अनिवार्य रूप से किया जाना चाहिए। यह चेकलिस्ट केवल सैद्धांतिक दस्तावेज नहीं है, बल्कि व्यावहारिक मार्गदर्शिका के रूप में तैयार की गई है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि जब कोई नागरिक या अधिवक्ता किसी सरकारी अधिकारी, पुलिस अधिकारी अथवा न्यायालय के समक्ष जाता है, तो उसके साथ न्यायपूर्ण, निष्पक्ष, समान और कानूनसम्मत व्यवहार कैसे किया जाना अनिवार्य है।
इस चेकलिस्ट का मूल उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि निर्दोष व्यक्तियों को किसी भी स्तर पर प्रताड़ित न किया जाए, उन्हें झूठे मामलों में न फँसाया जाए, और यदि किसी अपराध का घटित होना सिद्ध होता है, तो दोषियों के विरुद्ध बिना विलंब प्रभावी, निष्पक्ष और कानूनन कार्रवाई की जाए। इसमें जांच, गिरफ्तारी, अभियोजन, सुनवाई और निर्णय—प्रत्येक चरण में पालन किए जाने वाले संवैधानिक और वैधानिक मानकों को स्पष्ट रूप से रेखांकित किया गया है।
यह चेकलिस्ट सिविल और आपराधिक मामलों सहित प्रत्येक प्रकार की कार्यवाही में सभी संबंधित पक्षों द्वारा अपने विधिक कर्तव्यों के समुचित और कानूनसम्मत निर्वहन के लिए तैयार की गई है। यह सभी सार्वजनिक अधिकारियों, ट्रिब्यूनलों, आयोगों, लोकसेवकों, अधिवक्ताओं, पुलिस अधिकारियों, मंत्रियों तथा न्यायाधीशों पर लागू होने वाले सुप्रीम कोर्ट के बाध्यकारी आदेशों, दिशानिर्देशों और विधिक प्रावधानों का एक समेकित एवं व्यवस्थित संकलन है, जिनका पालन प्रत्येक स्तर पर अनिवार्य रूप से किया जाना आवश्यक है।
साथ ही, इस चेकलिस्ट में यह भी विस्तार से दर्शाया गया है कि यदि कर्तव्यपालन में लापरवाही, मनमानी, दुर्भावना या कानून की अवहेलना की जाती है, तो दोषी अधिवक्ताओं, सरकारी अधिवक्ताओं, वरिष्ठ अधिवक्ताओं, पुलिस अधिकारियों, मंत्रियों, तहसीलदारों, कलेक्टरों, जिला अधिकारियों तथा यहाँ तक कि न्यायाधीशों के विरुद्ध भी किन-किन कानूनी प्रावधानों के अंतर्गत कार्रवाई की जा सकती है। इन प्रावधानों को इस प्रकार क्रमबद्ध किया गया है कि पीड़ित नागरिक को यह स्पष्ट रूप से समझ में आ सके कि किस स्तर पर, किस अधिकारी के विरुद्ध और किस कानून के अंतर्गत कार्रवाई संभव है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अब केवल प्रत्यक्ष रूप से अपराध करने वाले अधिकारी ही नहीं, बल्कि दोषी अधिकारियों के विरुद्ध वैधानिक कार्रवाई करने से इंकार करने वाले, जाँच को बाधित करने वाले अथवा उन्हें बचाने का प्रयास करने वाले व्यक्ति भी समान रूप से दंड के भागीदार होंगे। इस प्रकार यह चेकलिस्ट न केवल अपराध और भ्रष्टाचार के विरुद्ध एक सशक्त औज़ार बनती है, बल्कि न्यायिक प्रणाली में जवाबदेही, पारदर्शिता और संवैधानिक अनुशासन को संस्थागत रूप से लागू करने का माध्यम भी सिद्ध होती है।
इस चेकलिस्ट और विधिक पुस्तिका की परिकल्पना देश के माननीय मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice of India) श्री सूर्यकांत जी द्वारा प्रस्तावित “National Judicial Policy” की भावना से प्रेरित है। माननीय CJI ने यह गंभीर चिंता व्यक्त की थी कि समान तथ्यों और समान कानून के बावजूद देश के विभिन्न न्यायालयों द्वारा परस्पर भिन्न आदेश पारित किए जा रहे हैं, जिससे समान न्याय के संवैधानिक सिद्धांत को ठेस पहुँचती है और आम नागरिक के साथ अन्याय होता है। उन्होंने स्पष्ट रूप से यह आवश्यकता रेखांकित की थी कि न्यायिक प्रणाली में एकरूपता, पूर्वानुमेयता और विधिक निश्चितता सुनिश्चित की जाए, ताकि प्रत्येक व्यक्ति को समान परिस्थितियों में समान न्याय प्राप्त हो सके।
इसी संदर्भ में Junior Advocates and Law Students Association of India के अधिवक्ता शिवम गुप्ता के साथ हुए पत्राचार में माननीय CJI श्री सूर्यकांत जी ने इस दिशा में सहयोग और रचनात्मक पहल की अपेक्षा व्यक्त की थी। उस संवाद से प्राप्त मार्गदर्शन और प्रेरणा के आधार पर, Junior Advocates and Law Students Association ने भारतीय बार एसोसिएशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष एडवोकेट निलेश ओझा के मार्गदर्शन में इस समेकित विधिक चेकलिस्ट एवं पुस्तिका को तैयार करने का कार्य प्रारंभ किया।
यह पुस्तिका किसी एक व्यक्ति या संस्था का प्रयास मात्र नहीं है, बल्कि यह सामूहिक विधिक चेतना का परिणाम है। इसके निर्माण में वरिष्ठ एवं कनिष्ठ अधिवक्ताओं, न्यायिक अधिकारियों, विधि छात्रों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, महिला अधिकार, पुरुष अधिकार एवं बाल अधिकार से जुड़े कार्यकर्ताओं, सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधियों के साथ-साथ आध्यात्मिक एवं नैतिक चिंतकों तक का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। सभी ने अपने-अपने अनुभव, अध्ययन और संवैधानिक समझ के आधार पर यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया है कि न्याय प्रणाली मानव-केन्द्रित, संवैधानिक और उत्तरदायी बने।
यह पहल देश की विधिक व्यवस्था में एक नए अध्याय की नींव रखने का कार्य कर रही है—ऐसा अध्याय जिसमें कानून केवल पुस्तकों तक सीमित न रहकर, व्यवहार में समान, निष्पक्ष और सुलभ न्याय का माध्यम बने। इस चेकलिस्ट और विधिक पुस्तिका का लाभ न केवल वर्तमान पीढ़ी को मिलेगा, बल्कि आने वाली कई पीढ़ियों तक यह न्यायिक पारदर्शिता, जवाबदेही और संवैधानिक मूल्यों को सुदृढ़ करती रहेगी। समाज के विभिन्न वर्गों—विधिक समुदाय, शिक्षाविदों, नागरिक संगठनों और आम जनता—द्वारा इस प्रयास की व्यापक रूप से सराहना की जा रही है, जो इसकी प्रासंगिकता और दूरगामी महत्व को दर्शाती है।