ईमानदार न्यायाधीशों को संरक्षण और दोषियों के विरुद्ध कठोर अनुशासनात्मक एवं आपराधिक कार्रवाई के निर्देश देने वाले ऐतिहासिक सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय का भारतीय बार एसोसिएशन ने अभिनंदन किया
नई दिल्ली | जनवरी 2026: भारतीय बार एसोसिएशन ने माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नववर्ष 2026 के शुभारंभ पर दिए गए ऐतिहासिक निर्णय Nirbhay Singh Suliya v. State of Madhya Pradesh (2026 INSC 7) का हार्दिक स्वागत किया है। यह निर्णय न्यायिक ईमानदारी, निष्पक्षता और जवाबदेही की एक ऐतिहासिक तथा संतुलित पुनः पुष्टि है, जो एक ओर ईमानदार न्यायाधीशों को झूठी, दुर्भावनापूर्ण एवं प्रतिशोधात्मक शिकायतों से प्रभावी संरक्षण प्रदान करता है, वहीं दूसरी ओर भ्रष्ट एवं बेईमान न्यायाधीशों के विरुद्ध कठोर अनुशासनात्मक एवं आपराधिक कार्रवाई के लिए स्पष्ट और दृढ़ दिशा-निर्देश देता है।
निर्णय के दो मूल स्तंभ: संरक्षण और जवाबदेही
माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट, बाध्यकारी और प्रवर्तनीय सिद्धांत निर्धारित किए हैं, ताकि—
- ईमानदार न्यायाधीशों को झूठी, प्रेरित एवं प्रतिशोधात्मक शिकायतों से संरक्षित किया जा सके; और
- वास्तविक शिकायतकर्ताओं की रक्षा करते हुए, जहाँ न्यायिक कदाचार प्रथम दृष्टया सिद्ध हो, वहाँ भ्रष्ट न्यायाधीशों के विरुद्ध अभियोजन सुनिश्चित किया जा सके।
न्यायालय ने स्पष्ट रूप से निर्देश दिया है कि न्यायिक अधिकारियों के विरुद्ध झूठी और तुच्छ शिकायतें करने वालों के खिलाफ कानून के अनुसार कठोर एवं सख्त कार्रवाई की जाए, जिसमें उपयुक्त मामलों में न्यायालय की अवमानना की कार्यवाही भी सम्मिलित हो सकती है।
तुच्छ शिकायतकर्ताओं एवं दुराचारी अधिवक्ताओं के विरुद्ध कार्रवाई
माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया है कि यदि कोई झूठी या तुच्छ शिकायत किसी बार सदस्य द्वारा की जाती है या साजिशपूर्वक करवाई जाती है, तो उच्च न्यायालय को केवल अवमानना कार्यवाही तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि संबंधित बार काउंसिल को अनुशासनात्मक कार्रवाई हेतु संदर्भ भेजना अनिवार्य है।
बार काउंसिलों को ऐसे संदर्भ प्राप्त होने पर त्वरित एवं समयबद्ध निर्णय लेने का निर्देश दिया गया है, जिससे कानूनी पेशे में संस्थागत अनुशासन सुनिश्चित हो सके।
भ्रष्टाचार के लिए कोई संरक्षण नहीं: जहाँ आवश्यक हो दोषी न्यायाधीश के विरुद्ध अभियोजन अनिवार्य
साथ ही, यह निर्णय न्यायिक भ्रष्टाचार एवं कदाचार के प्रति शून्य सहनशीलता का एक स्पष्ट और कठोर संदेश देता है। माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने निर्विवाद रूप से घोषित किया है कि—
· जहाँ किसी न्यायिक अधिकारी के विरुद्ध की गई शिकायत प्रथम दृष्टया सत्य पाई जाए, वहाँ तत्काल अनुशासनात्मक कार्यवाही प्रारंभ की जानी चाहिए;
· आरोप सिद्ध होने की स्थिति में किसी भी प्रकार की रियायत या नरमी नहीं बरती जानी चाहिए; तथा
· जहाँ कदाचार में आपराधिक तत्व विद्यमान हों, वहाँ उच्च न्यायालय को संबंधित दोषी न्यायाधीश के विरुद्ध आपराधिक अभियोजन प्रारंभ करने में किसी भी प्रकार का संकोच नहीं करना चाहिए।
माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि न्यायपालिका की निष्पक्षता और प्रतिष्ठा को कलंकित करने वाले “काले भेड़ों” को बाहर करने का यही एकमात्र प्रभावी और संवैधानिक तरीका है।
यह ऐतिहासिक निर्णय माननीय न्यायमूर्ति जे. बी. पारदीवाला एवं माननीय न्यायमूर्ति के. वी. विश्वनाथन की पीठ द्वारा दिया गया।
उल्लेखनीय है कि माननीय न्यायमूर्ति जे. बी. पारदीवाला ने इससे पूर्व भी न्यायिक क्षमता, दक्षता और जवाबदेही के विषय में कठोर, स्पष्ट और सिद्धांतगत दृष्टिकोण अपनाया है।
Shikhar Chemicals v. State of Uttar Pradesh, 2025 SCC OnLine SC 1653 में उन्होंने एक उच्च न्यायालय के न्यायाधीश द्वारा आपाराधिक मामलों में कानून की गंभीर समझ के अभाव पर कड़ी टिप्पणियाँ कीं तथा संबंधित माननीय मुख्य न्यायाधीश को निर्देश दिया कि ऐसे न्यायाधीश को आपराधिक मामले न सौंपे जाएँ।
इन दोनों निर्णयों को एक साथ पढ़ने पर न्यायपालिका का स्पष्ट और सुसंगत दृष्टिकोण उभरकर सामने आता है कि—
· ईमानदार और सक्षम न्यायाधीशों का संरक्षण अनिवार्य है;
· न्यायिक अक्षमता, लापरवाही या कदाचार को संस्थागत स्तर पर सहन नहीं किया जा सकता; और
· न्यायिक जवाबदेही, न्याय व्यवस्था में जन-विश्वास बनाए रखने की एक अनिवार्य एवं अपरिहार्य शर्त है।
‘विच-हंट’ के विरुद्ध सुरक्षा
न्यायालय ने यह भी स्पष्ट रूप से चेतावनी दी है कि अत्यधिक सावधानी और विवेक आवश्यक है।
केवल गलत आदेश या निर्णय में त्रुटि, बिना किसी अतिरिक्त दुर्भावनापूर्ण तत्व के, न तो अनुशासनात्मक कार्यवाही का आधार बन सकती है और न ही अभियोजन का।
यह संतुलन, भारतीय बार एसोसिएशन के अनुसार, न्यायिक स्वतंत्रता को सुदृढ़ करता है और जन-विश्वास को पुनः स्थापित करता है।
लंबित शिकायतों एवं जन-विश्वास के लिए महत्व
भारतीय बार एसोसिएशन का मानना है कि यह निर्णय सुदृढ़ और सत्यापित साक्ष्यों पर आधारित लंबित शिकायतों के निष्पक्ष एवं सिद्धांतगत निपटारे में अत्यंत सहायक सिद्ध होगा।
यह निर्णय स्पष्ट संवैधानिक मार्गदर्शन प्रदान करता है, जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि शिकायतें न तो निष्क्रियता के कारण दबा दी जाएँ और न ही दुर्भावना के हथियार के रूप में प्रयुक्त हों।
न्यायिक सुधार की दिशा में एक निर्णायक क्षण
यह निर्णय, जिस पर प्रमुख विधिक मंचों और विशेषज्ञों द्वारा व्यापक चर्चा हो रही है, भारत में न्यायिक सुधार की दिशा में एक निर्णायक मोड़ है। यह ईमानदार न्यायाधीशों को संस्थागत सुरक्षा प्रदान करता है, वास्तविक व्हिसलब्लोअर्स को सशक्त करता है, और यह स्पष्ट करता है कि न्यायपालिका अपने भीतर के भ्रष्टाचार को किसी भी स्थिति में संरक्षण नहीं देगी।
भारतीय बार एसोसिएशन ने इस संतुलित, साहसिक और संवैधानिक रूप से सुदृढ़ निर्णय के लिए माननीय सर्वोच्च न्यायालय के प्रति गहन आभार व्यक्त किया है, जो कानून के शासन, न्यायिक जवाबदेही और न्याय प्रणाली में जन-विश्वास को मजबूत करता है।
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