सुप्रीम कोर्ट ने युवा वकील का पत्र PIL के रूप में दर्ज किया — क्यूरेटिव पिटीशन में ‘सीनियर काउंसिल सर्टिफिकेट’ की अनिवार्यता से आम नागरिकों और जूनियर वकीलों के अधिकारों के हनन का मुद्दा उठाया [SCI/PIL/18039/L/2026]
नई दिल्ली। देश के सर्वोच्च न्यायालय ने युवा अधिवक्ता एडवोकेट देवकृष्ण भंबरी द्वारा भेजे गए एक महत्वपूर्ण पत्र को जनहित याचिका के रूप में स्वीकार करते हुए PIL (E) श्रेणी में दर्ज कर लिया है। यह याचिका क्यूरेटिव पिटीशन दाखिल करने के लिए सीनियर एडवोकेट के प्रमाणपत्र की अनिवार्यता वाले नियम को चुनौती देती है।
यह लेटर-PIL इंडियन बार एसोसिएशन के कोऑर्डिनेटर एडवोकेट देवकृष्ण भंबरी द्वारा राष्ट्रीय संविधान रक्षा समिति (SRS) के राष्ट्रीय अध्यक्ष एडवोकेट निलेश ओझा द्वारा उठाए गए मुद्दों तथा जूनियर एडवोकेट्स एंड लॉ स्टूडेंट्स एसोसिएशन (JALSA) की चिंताओं के आधार पर भेजी गई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने इस पत्र को PIL (E) श्रेणी में दर्ज किया है। PIL (E) का अर्थ “पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन (एपिस्टल)” होता है। इस श्रेणी में वे मामले आते हैं, जो औपचारिक याचिका के बजाय पत्र (Letter) के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट या भारत के मुख्य न्यायाधीश को भेजे जाते हैं। ऐसे मामलों में अदालत स्वयं संज्ञान लेकर (सुओ मोटू) पत्र को ही याचिका मानकर सुनवाई शुरू करती है।
सिविल सोसाइटी, बार एसोसिएशनों, युवा अधिवक्ताओं, आम नागरिकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने सामान्य जनता, लाखों जूनियर वकीलों तथा एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड की समस्याओं पर ध्यान देने के लिए भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत का आभार व्यक्त किया है।
याचिका में सीनियर एडवोकेट के प्रमाणपत्र की अनिवार्य शर्त समाप्त करने की मांग की गई है। साथ ही यह भी आग्रह किया गया है कि क्यूरेटिव पिटीशन किसी भी अधिवक्ता या एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड के प्रमाणीकरण के आधार पर स्वीकार की जाए तथा स्वयं उपस्थित होने वाले पक्षकारों (पार्टी-इन-पर्सन) द्वारा दिए गए उपक्रमों को भी मान्यता दी जाए।
उल्लेखनीय है कि सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ ने Prem Chand Garg बनाम Excise Commissioner, U.P., AIR 1963 SC 996 में सुप्रीम कोर्ट नियमों के उन प्रावधानों को रद्द कर दिया था, जो संवैधानिक उपचारों के प्रयोग पर प्रतिबंध लगाते थे। संविधान पीठ ने स्पष्ट कहा था कि सर्वोच्च न्यायालय ऐसे नियम नहीं बना सकता जो नागरिकों के मौलिक अधिकारों, विशेषकर न्याय तक पहुँच के अधिकार, को बाधित करें।
न्यायालय ने यह भी कहा कि संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन में बाधा डालने वाला कोई भी प्रक्रियात्मक नियम मान्य नहीं हो सकता। यह सिद्धांत स्थापित किया गया कि संविधान के अनुच्छेद 145 के तहत सुप्रीम कोर्ट की नियम बनाने की शक्ति संविधान के भाग-III (मौलिक अधिकारों) के अधीन है। स्वयं सुप्रीम कोर्ट द्वारा बनाए गए नियम भी नागरिकों के मौलिक अधिकारों को सीमित या उनका उल्लंघन नहीं कर सकते और न ही न्याय तक पहुँच में किसी प्रकार का अवरोध उत्पन्न कर सकते हैं।
इस महत्वपूर्ण कदम को न्याय तक समान पहुँच की दिशा में एक बड़ी पहल माना जा रहा है।विस्तृत समाचार :
नई दिल्ली। एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने 18 फरवरी 2026 को बॉम्बे हाईकोर्ट के युवा अधिवक्ता एडवोकेट देवकृष्ण भंबरी द्वारा भेजे गए पत्र पर संज्ञान लेते हुए उसे PIL (E) श्रेणी के अंतर्गत जनहित याचिका के रूप में दर्ज कर लिया है। एडवोकेट भंबरी इंडियन बार एसोसिएशन के समन्वयक (Coordinator) हैं।
यह पत्र राष्ट्रीय संविधान रक्षा समिति (SRS) के राष्ट्रीय अध्यक्ष एडवोकेट निलेश ओझा द्वारा उठाई गई चिंताओं तथा जूनियर एडवोकेट्स एंड लॉ स्टूडेंट्स एसोसिएशन (JALSA) के साथ मिलकर प्रस्तुत किए गए मुद्दों के आधार पर भेजा गया था। अपने विस्तृत लेख में एडवोकेट ओझा ने यह दर्शाया कि क्यूरेटिव पिटीशन दाखिल करने के लिए सीनियर एडवोकेट के प्रमाणपत्र की अनिवार्यता असंवैधानिक है, मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती है और आम नागरिकों तथा उन अधिकांश अधिवक्ताओं एवं एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड के लिए न्याय तक समान पहुँच में गंभीर बाधा उत्पन्न करती है, जिन्हें सीनियर एडवोकेट का दर्जा प्राप्त नहीं है।
साथ ही यह भी कहा गया कि यह शर्त विशेष रूप से उन गरीब नागरिकों के लिए अत्यंत कठिनाई पैदा करती है, जिनके पास सीनियर अधिवक्ताओं की भारी-भरकम फीस वहन करने के लिए संसाधन नहीं होते, तथा उन व्यक्तियों के लिए भी जो बिना वकील की सहायता के स्वयं अपना मामला लड़ना चाहते हैं।
पत्र में सीनियर एडवोकेट के अनिवार्य प्रमाणपत्र की शर्त को चुनौती दी गई है, जिसे संविधान पीठ ने रूपा अशोक हुरा बनाम अशोक हुरा (2002) मामले में निर्धारित किया था। याचिका में कहा गया है कि यह शर्त संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन करती है।
राष्ट्रीय संविधान रक्षा समिति (RSRS) के उपाध्यक्ष एडवोकेट विवेक रामटेके; सुप्रीम कोर्ट लॉयर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष एडवोकेट ईश्वरलाल अग्रवाल; सुप्रीम कोर्ट एवं हाईकोर्ट लिटिगेंट्स एसोसिएशन के अध्यक्ष राशिद खान पठान; इंडियन लॉयर्स एंड ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्ट्स एसोसिएशन के उपाध्यक्ष मुरसलीन शेख; इंडियन बार एसोसिएशन की महिला प्रकोष्ठ समन्वयक एडवोकेट निक्की पोकर; तथा JALSA के एडवोकेट विकास पवार और सोनल मंचेकर ने लंबे समय से लंबित अन्याय के मुद्दे पर संज्ञान लेने के लिए भारत के माननीय मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत तथा सुप्रीम कोर्ट के माननीय न्यायाधीशों के प्रति अपनी हार्दिक कृतज्ञता व्यक्त की है।
उन्होंने कहा कि विवादित नियम के कारण बड़ी संख्या में आम नागरिकों, जूनियर अधिवक्ताओं और आर्थिक रूप से कमजोर वादकारियों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है, क्योंकि इससे क्यूरेटिव पिटीशन जैसे अंतिम संवैधानिक उपाय — जो न्याय की संभावित विफलता के विरुद्ध अंतिम सुरक्षा माना जाता है — का लाभ उठाने की उनकी क्षमता प्रभावी रूप से सीमित हो गई थी।