[सबसे बड़ी ब्रेकिंग] सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट को कड़ी फटकार लगाई — बंधनकारी नज़ीरों (Binding Precedents) की अनदेखी और मनमाने आदेश पारित करने पर कड़ा रुख अपनाया
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि न्यायपालिका में “जज का मूड नहीं, बल्कि कानून ही सर्वोपरि होना चाहिए।” अदालत ने सख्त शब्दों में चेतावनी दी कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा घोषित कानून का पालन करना न्यायाधीशों का संवैधानिक दायित्व है — यह व्यक्तिगत विवेक का विषय नहीं है।
सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि जो न्यायाधीश बंधनकारी नज़ीरों का पालन नहीं करते, वे न केवल कानून के शासन (Rule of Law) को कमजोर करते हैं, बल्कि न्यायपालिका की साख को भी धूमिल करते हैं, और इससे मुकदमादारों पर अतिरिक्त खर्च, देरी और अनिश्चितता का बोझ बढ़ता है।
अदालत ने स्पष्ट टिप्पणी की कि ऐसे न्यायाधीश राष्ट्र द्वारा उन पर रखे गए विश्वास से विश्वासघात करते हैं, क्योंकि यह आचरण न्यायिक शपथ का उल्लंघन है और न्यायपालिका तथा उन नागरिकों के प्रति गंभीर अन्याय है, जिनके अधिकारों की रक्षा के लिए न्यायालय अस्तित्व में है।
सुप्रीम कोर्ट ने चेतावनी दी है कि ऐसे न्यायाधीश पूरे न्यायिक तंत्र की साख को धूमिल करते हैं, कानून के शासन में जनता का विश्वास कमजोर करते हैं, और न्याय वितरण प्रणाली की निष्पक्षता और गरिमा को आघात पहुँचाते हैं।
अदालत ने इस तरह के व्यवहार की निंदा करते हुए कहा कि “न्यायाधीश बदला लेने नहीं बैठते; न्याय का हथौड़ा तर्क का प्रतीक है, प्रतिशोध का हथियार नहीं।”
सुप्रीम कोर्ट ने आगे कहा कि बंधनकारी नज़ीरों (Binding Precedents) का विरोध या उन्हें न मानना कानून की एकरूपता को कमजोर करता है, वादकारियों पर अनावश्यक खर्च और देरी का बोझ डालता है, और यह खतरनाक धारणा पैदा करता है कि न्याय निर्णय के बजाय न्यायाधीश की पहचान पर निर्भर करता है।
दो अहम निर्णयों में, जिनमें 7 नवंबर 2025 का हालिया फैसला भी शामिल है, सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट की कड़ी निंदा की, यह कहते हुए कि उसने सुप्रीम कोर्ट के बंधनकारी निर्णयों की अनदेखी की और मनमाने आदेश पारित किए। अदालत ने दोहराया कि संविधान के अनुच्छेद 141 के तहत सुप्रीम कोर्ट द्वारा घोषित कानून पूरे देश के सभी न्यायालयों और प्राधिकरणों पर बाध्यकारी है, और इसका पालन करना प्रत्येक न्यायाधीश का संवैधानिक दायित्व है।
इन हालिया निर्णयों से बॉम्बे हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश श्री चंद्रशेखर की मुसीबतें और बढ़ गई हैं। बताया गया है कि 16 अक्टूबर 2025 को उन्होंने यह राय व्यक्त की कि सुप्रीम कोर्ट के निर्णय “देश का कानून” नहीं हैं और वे बंधनकारी नज़ीरों का पालन करने के लिए बाध्य नहीं हैं। उन्होंने न केवल सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का पालन करने से इनकार किया, बल्कि यह भी चेतावनी दी कि जो भी वकील सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों का हवाला देगा, उसे अदालत की अवमानना का दोषी ठहराकर हिरासत में लिया जाएगा।
7 नवम्बर 2025 को माननीय न्यायमूर्तियों विक्रम नाथ एवं प्रसन्न बी. वराले की पीठ ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा घोषित विधि का पालन करना देश के सभी न्यायालयों का संवैधानिक कर्तव्य है — न कि व्यक्तिगत विवेक का विषय।
इसी संदर्भ में, रतीलाल झवेरीभाई परमार बनाम गुजरात राज्य (2024 SCC OnLine SC 298) के प्रकरण में माननीय न्यायमूर्तियों दीपांकर दत्ता और प्रशांत कुमार मिश्रा ने स्पष्ट किया कि जो न्यायाधीश सुप्रीम कोर्ट द्वारा प्रतिपादित विधि को लागू करने से इनकार करते हैं, वे राष्ट्र द्वारा उन पर रखे गए विश्वास के साथ विश्वासघात करते हैं।
अदालत ने कहा कि ऐसा आचरण न्यायाधीश पद ग्रहण करते समय ली गई शपथ का उल्लंघन है और यह न्यायपालिका तथा नागरिकों — दोनों के प्रति गंभीर द्रोह और दायित्वहीनता का द्योतक है।
अदालत ने चेतावनी दी कि ऐसे न्यायाधीश न्यायपालिका की गरिमा को कलंकित करते हैं और याद दिलाया कि वर्तमान पारदर्शिता के युग में न्यायाधीश भी जन-जवाबदेही के दायरे में हैं। समाज उनसे अपेक्षा करता है कि वे ईमानदारी, निष्ठा और नैतिकता के आदर्श बनें।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अधिकांश न्यायाधीश सराहनीय कार्य कर रहे हैं, परंतु कुछ की अनुशासनहीनता और मनमानी न्यायपालिका की साख को आघात पहुँचाती है, जिसे थोड़ी सावधानी और संविधान के प्रति सम्मान से टाला जा सकता था।
पीठ ने तीखी टिप्पणी की कि उच्च न्यायालय का रवैया ऐसा प्रतीत होता है मानो उसने बंधनकारी नज़ीरों को लागू करने के बजाय जानबूझकर न लागू करने का मार्ग चुना हो।
अदालत ने दोहराया कि अनुच्छेद 141 और 144 के अंतर्गत सुप्रीम कोर्ट की विधि का पालन करना न्यायाधीशों का संवैधानिक आदेश है, कोई विकल्प नहीं।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बंधक नज़ीरों की अनदेखी कानून की एकरूपता तोड़ती है, न्याय-प्रक्रिया को विकृत करती है और जनता में यह भ्रम पैदा करती है कि न्यायाधीश की मनोवृत्ति ही कानून है।
अदालत ने इसे “न्यायिक मर्यादा के प्रतिकूल तुच्छता” बताते हुए याद दिलाया कि “न्यायाधीश का हथौड़ा तर्क का प्रतीक है, प्रतिशोध का नहीं।”
सुप्रीम कोर्ट ने अंत में स्पष्ट किया कि उसके द्वारा घोषित विधि ही देश का विधि-सिद्धांत है, जो अनुच्छेद 141 के तहत सभी न्यायालयों और प्राधिकरणों पर बाध्यकारी है।
इसके अतिरिक्त, मुख्य न्यायाधीश (CJI) भूषण गवई द्वारा 7 नवम्बर को बॉम्बे उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश चंद्रशेखर की उपस्थिति में दिए गए यह वक्तव्य — कि “न्यायाधीश सामंती शासक नहीं हैं” — न्यायमूर्ति चंद्रशेखर जैसे उन न्यायाधीशों के लिए एक सूक्ष्म किंतु कड़ा संदेश माना जा रहा है, जिन पर सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों की अवहेलना और मनमानी करने के आरोप लगे हैं।
विभिन्न बार एसोसिएशनों ने कोलेजियम की तीखी आलोचना करते हुए कहा कि न्यायमूर्ति चंद्रशेखर की बॉम्बे उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के रूप में नियुक्ति न्यायपालिका के सम्मान के विपरीत कदम है।
एसोसिएशनों ने कहा कि “जो व्यक्ति कानून की मूलभूत समझ तक नहीं रखता, किंतु स्वयं को संविधान और सर्वोच्च न्यायालय से ऊपर समझता है, उसे देश के प्रमुख उच्च न्यायालयों में से एक की अध्यक्षता करने का नैतिक अधिकार नहीं है।”
इन संगठनों ने न्यायमूर्ति चंद्रशेखर के न्यायिक कार्यों को तत्काल निलंबित करने और महाराष्ट्र से स्थानांतरण की मांग की है, यह कहते हुए कि उनके आचरण ने संपूर्ण न्यायपालिका की साख पर आघात पहुँचाया है।
ये दोनों निर्णय अब ऐतिहासिक मील के पत्थर और लाखों पीड़ित नागरिकों के लिए आशा की किरण के रूप में देखे जा रहे हैं, जो वर्षों से अहंकारी, पक्षपाती और मनमौजी न्यायाधीशों की मनमानी का शिकार होते आए हैं। दशकों से असंख्य वादकारियों और अधिवक्ताओं को उन न्यायालयों में अपमान, अन्याय और भय का सामना करना पड़ा है, जहाँ कुछ न्यायाधीशों ने अपने व्यक्तिगत अहंकार को कानून से ऊपर रखा।
देशभर के कानूनी विशेषज्ञों और नागरिकों ने सुप्रीम कोर्ट के माननीय न्यायाधीशों का स्वागत करते हुए इन निर्णयों को न्यायिक जवाबदेही और संविधान की सर्वोच्चता बहाल करने की दिशा में ऐतिहासिक कदम बताया है।
सर्वोच्च न्यायालय का यह स्पष्ट संदेश — कि “न्यायाधीश सामंती शासक नहीं, बल्कि संविधान के सेवक हैं” — वकीलों से लेकर आम नागरिक तक, सभी के मन में गूंज रहा है।
ये निर्णय न्यायिक उत्तरदायित्व और पारदर्शिता के एक नए युग की शुरुआत का संकेत देते हैं, यह सुनिश्चित करते हुए कि अब कोई भी न्यायाधीश स्वयं को कानून से ऊपर नहीं समझ सकेगा, और सुप्रीम कोर्ट की प्रतिष्ठा तथा अनुच्छेद 141 की पवित्रता अक्षुण्ण बनी रहेगी।
ऐसे न्यायाधीशों के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट की कार्रवाई :
हाल ही में शिखर केमिकल्स बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2025 SCC OnLine SC 1653) के मामले में, भारत के सर्वोच्च न्यायालय के माननीय न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला ने एक उच्च न्यायालय के न्यायाधीश द्वारा प्रदर्शित कानूनी समझ के अत्यंत निम्न स्तर की कड़ी निंदा की।
अदालत ने उस उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को निर्देश दिया कि संबंधित न्यायाधीश को कोई भी न्यायिक कार्य न सौंपा जाए, यह कहते हुए कि ऐसी अयोग्यता और स्थापित विधि की अवहेलना न्यायपालिका के भीतर किसी भी स्थिति में सहन नहीं की जा सकती।
वर्तमान परिप्रेक्ष्य में स्थिति और भी चिंताजनक एवं गंभीर है, क्योंकि ऐसी घोर त्रुटियाँ करने वाले व्यक्ति स्वयं बॉम्बे उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति चंद्रशेखर हैं।
उनका आचरण संविधान के सबसे बुनियादी सिद्धांत की अज्ञानता को उजागर करता है — कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 141 के अनुसार,
“सर्वोच्च न्यायालय द्वारा घोषित विधि पूरे देश के सभी न्यायालयों और प्राधिकरणों — यहाँ तक कि न्यायाधीशों पर भी — बाध्यकारी होती है।”
यह एक सुस्पष्ट एवं स्थापित विधिक सिद्धांत है कि प्रत्येक न्यायाधीश, मुख्य न्यायाधीश तथा समान (co-equal bench) या निम्न पीठ (Smaller Benches) की शक्ति रखने वाले सभी न्यायालय श्रेष्ठ न्यायालयों द्वारा प्रतिपादित विधि के अनुपालन हेतु बाध्य हैं।
कोई भी न्यायालय बंधनकारी नज़ीरों (Binding Precedents) के विपरीत दृष्टिकोण नहीं अपना सकता।
न्यायालय का यह संवैधानिक दायित्व है कि वह पक्षकारों द्वारा उद्धृत सभी निर्णयों — चाहे वे अन्य उच्च न्यायालयों (other High Courts) के ही क्यों न हों — पर विचार करे, उनका Ratio Decidendi (निर्णय का मूल कारण) दर्ज करे,
और यदि किसी मामले में कोर्ट द्वारा उन निर्णयों में प्रतिपादित विधिक सिद्धांतों का लाभ किसी वकील या नागरिक को नहीं दिया जा रहा है,
तो न्यायालय को अपने आदेश में यह स्पष्ट और तर्कसंगत कारण लिखना आवश्यक है कि ऐसा लाभ क्यों नहीं दिया जा रहा है।
यह पारदर्शिता और जवाबदेही न्यायिक आचरण का अभिन्न अंग है और संविधान के अनुच्छेद 141 के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रतिपादित विधि की बाध्यकारी प्रकृति का प्रत्यक्ष प्रतिबिंब है। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने अनेक ऐतिहासिक निर्णयों में यह कठोर चेतावनी दी है कि न्यायाधीश केवल इस आधार पर किसी नज़ीर की अवहेलना नहीं कर सकते कि “मामले के तथ्य भिन्न हैं।”
एक बार जब किसी नागरिक के पक्ष में कानून की व्याख्या हो जाती है, तो इसी प्रकार की स्थिति वाले अन्य नागरिकों को भी वही लाभ प्राप्त होना चाहिए। उन्हें बार-बार न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता, क्योंकि न्याय समान रूप से सबके लिए है। अतः न्यायाधीशों का यह संवैधानिक एवं नैतिक दायित्व है कि वे सही कानून को लागू करें और उसका लाभ सभी नागरिकों को समान रूप से प्रदान करें।
न्यायाधीश यह बहाना नहीं बना सकते कि उन्हें सर्वोच्च न्यायालय द्वारा बनाए गए कानून या बंधनकारी निर्णयों की जानकारी नहीं थी, क्योंकि यह अज्ञानता स्वयं में न्यायिक शपथ का उल्लंघन और संविधान के अनुच्छेद 141 की अवमानना है। यदि कोई न्यायाधीश किसी बंधनकारी नज़ीर (Binding Precedent) की अवहेलना करके कोई न्यायिक आदेश पारित करता है, तो वह आदेश कानून की दृष्टि में शून्य (Vitiated in Law) माना जाता है, और संबंधित न्यायाधीश “Judicial Adventurism” (न्यायिक मनमानी) का दोषी होता है। ऐसा आचरण Contempt of Courts Act, 1971 की धारा 2(ब) और धारा 12 के अंतर्गत न्यायालय की अवमानना (Contempt of Court) के दायरे में आता है। किसी भी नागरिक को ऐसे न्यायाधीश के विरुद्ध अवमानना याचिका (Contempt Petition) दाखिल करने का पूर्ण अधिकार है।
सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया है कि यदि कोई न्यायाधीश जानबूझकर सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों की अवहेलना करता है, तो उसे अवमानना से कोई प्रतिरक्षा (Immunity) या विशेषाधिकार (Privilege) प्राप्त नहीं होता। ऐसी स्थिति में न्यायाधीश स्वयं कानून के उल्लंघनकर्ता माने जाते हैं और उन पर वैधानिक कार्यवाही की जा सकती है।
इसके अतिरिक्त, जो न्यायाधीश इस प्रकार कानून की अवहेलना करते हैं, उन्हें कानूनी द्वेष (Legal Malice), न्यायिक बेईमानी (Judicial Dishonesty) और विकृत आचरण (Perversity) का दोषी माना जाता है। ऐसे न्यायाधीशों पर अनुशासनात्मक (Disciplinary) तथा फौजदारी कार्रवाई (Criminal Action) की जा सकती है, जिसमें निलंबन (Suspension), पदच्युति (Dismissal) या भारतीय दंड संहिता की धारा 166, 218, 219 और 220 के अंतर्गत अभियोजन (Prosecution) भी शामिल है। जो न्यायाधीश अपनी शपथ का उल्लंघन (Breach of Oath) करता है, वह पद से हटाए जाने (Removal) के लिए भी उत्तरदायी होता है — और यह कार्रवाई नागरिक द्वारा उसके आदेशों को चुनौती देने के अधिकार से स्वतंत्र रूप से की जा सकती है।
सर्वोच्च न्यायालय ने इन सिद्धांतों की पुनः पुष्टि अनेक निर्णयों में की है, जिनमें प्रमुख हैं —
[ Harish Arora vs The Dy. Registrar 2025 SCC On Line Bom 2853; Pradip J. Mehta v. Commissioner of Income Tax, (2008) 14 SCC 283, ;Union of India v. K.S. Subramanian, (1976) 3 SCC 677, Re: C. S. Karnan (2017) 7 SCC 1; Suprita Chandel vs. Union of India (2024 INSC 942), R.R. Parekh Vs. High Court of Gujrat (2016) 14 SCC 1, Superintendent of Central Excise Vs. Somabhai Ranchhodhbhai Patel AIR 2001 SC 1975, Umesh Chandra Vs State of Uttar Pradesh & Ors. 2006 (5) AWC 4519 ALL; Prominent Hotels Vs. New Delhi Municipal Corporation 2015 SCC OnLine Del 11910, Re: M. P. Dwivedi (1996) 4 SCC 152.; State Bank of Travancore V/s. Mathew K.C., (2018) 3 SCC 85, Emkay Exports v. Madhusudan Shrikrishna, 2008 SCC OnLine Bom 598 (Bom), Vijay Shekhar v. Union of India, (2004) 4 SCC 666, Rabindra Nath Singh v. Rajesh Ranjan Pappu Yadav, (2010) 6 SCC 417; Kamisetty Pedda v. Chinna 2004 SCC OnLine AP 1009; Som Mittal v. Govt. of Karnataka, (2008) 3 SCC 574 In , R. C. Pollard vs Satya Gopal Mazumdar 1943 SCC OnLine Cal 153; K. C. Chandy Vs. R.Balakrishna Pillai, AIR 1986 Ker 116, Baradakant Mishra Vs. Registrar of Orissa High Court (1973) 1 SCC 374; Smt. Prabha Sharma Vs. Sunil Goyal and Ors. (2017) 11 SCC 77; Legrand Pvt. Ltd. 2007 (6) Mh.L.J.146; Govind Mehta Vs. State of Bihar (1971) 3 SCC 329, K. Rama Reddy Vs State 1998 (3) ALD 305, Raman Lal Vs. State 2001 Cri. L. J. 800; Jagat Jagdishchandra Patel Vs. State of Gujrat 2016 SCC OnLine Guj 4517; Shrirang Yadavrao Waghmare v. State (2019) 9 SCC 144, Muzaffar Husain vs. State 2022 SCC OnLine SC 567 ; S.P. Gupta v. Union of India, 1981 Supp SCC 87; Garware Polyester Ltd. Vs. State of Maharashtra. 2010 SCC On Line Bom 2223, Shreyas Dange vs. State of Maharashtra through its Principal Secretary, 2018 SCC OnLine Bom 21510; Tata Mohan Rao v. S. Venkateswarlu And Others etc. 2025 INSC 678; Vishal Ashwin Patel v. CIT (2022) 14 SCC 817; Neeharika Infrastructure Pvt. Ltd. 2021 SCC OnLine SC 315 ]
प्रदीप जे. मेहता बनाम आयकर आयुक्त, (2008) 14 एससीसी 283 के मामले में,
माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट रूप से यह निर्णय दिया कि प्रत्येक न्यायालय, जिसमें उच्च न्यायालय भी शामिल हैं, के लिए यह अनिवार्य (Mandatory) है कि यदि वह किसी अन्य उच्च न्यायालय के निर्णय से भिन्न दृष्टिकोण अपनाने जा रहा है,
तो उसे उन निर्णयों का संदर्भ (Reference) देना और उन पर विस्तृत चर्चा (Discussion) करना आवश्यक है।
इसी प्रकार, सुब्रत रॉय सहारा बनाम भारत संघ, (2014) 8 एससीसी 470 में,
सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि यदि दो न्यायाधीशों की पीठ (Two-Judge Bench) तीन न्यायाधीशों की पीठ (Three-Judge Bench) के आदेश के विपरीत कोई दृष्टिकोण अपनाती है, तो वह अवमानना (Contempt) की दोषी मानी जाएगी।
मामले की संक्षिप्त पृष्ठभूमि :–
बॉम्बे हाईकोर्ट ने न्यायमूर्ति रेवती मोहिते डेरे के विरुद्ध भ्रष्टाचार, दस्तावेज़ों में जालसाज़ी (Forgery) तथा न्यायालयी अभिलेखों में झूठी गवाही (Perjury) जैसे गंभीर आरोपों की सुनवाई हेतु पाँच न्यायाधीशों वाली संविधान पीठ (Five-Judge Constitution Bench) का गठन किया है।
ये आरोप उस समय से संबंधित हैं जब उन्होंने वीडियोकॉन ग्रुप से जुड़े बहु-हज़ार करोड़ के बैंक घोटाले में आरोपी सुश्री चंदा कोचर को और पुलिस अधिकारियों पर हत्या के प्रयास (Attempt to Murder) के गंभीर अपराध में दूसरे आरोपी को जमानत दी थी — जिसमें यह कहा गया कि उन्होंने सीबीआई रिपोर्ट और न्यायालय के आदेशों को दबाकर (Suppress करके) सर्वोच्च न्यायालय के दिशा-निर्देशों का उल्लंघन किया।
ये आरोप जनहित याचिका (PIL) संख्या 6900/2023 में उठाए गए थे और अधिवक्ता निलेश सी. ओझा ने इसकी जानकारी मीडिया के माध्यम से सार्वजनिक की थी।
इसी प्रकार के आरोपों पर पहले बॉम्बे बार एसोसिएशन द्वारा की गई अवमानना कार्यवाही की माँग को 18 अप्रैल 2023 को सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और बॉम्बे हाईकोर्ट – दोनों ने खारिज कर दिया था।
हालाँकि, इन तथ्यों को दबाकर न्यायमूर्ति रेवती मोहिते डेरे द्वारा 04 अप्रैल 2025 को लिखे गए पत्र के आधार पर नई अवमानना कार्यवाही (Contempt Proceedings) शुरू की गई।
अवमानना नोटिस के जवाब में, अधिवक्ता निलेश ओझा ने कई सर्वोच्च न्यायालय के बंधनकारी निर्णयों (Binding Judgments) का हवाला देते हुए कहा कि यह कार्यवाही अवैध है और निरस्त की जानी चाहिए, तथा न्यायमूर्ति रेवती मोहिते डेरे और उनके सह-साजिशकर्ताओं (Co-conspirators) के विरुद्ध कार्यवाही होनी चाहिए और उन्हें पक्षकार के रूप में जोड़ा जाना चाहिए।
इसके बावजूद, मुख्य न्यायाधीश चंद्रशेखर की पीठ ने 17 सितम्बर 2025 के आदेश से न्यायमूर्ति डेरे को पक्षकार बनाने की माँग खारिज कर दी और सर्वोच्च न्यायालय के निरस्त किए गए निर्णयों (Overruled Judgments) पर आधारित होकर अधिवक्ता ओझा के विरुद्ध अलग अवमानना कार्यवाही प्रारंभ करने का आदेश दे दिया।
इस आदेश में सोलह अधिवक्ताओं के विरुद्ध कठोर टिप्पणियाँ (Strictures) भी की गईं, बिना उन्हें सुने।
6 अक्टूबर 2025 को, सर्वोच्च न्यायालय ने P. Radhakrishnan बनाम Cochin Devaswom Board, 2025 SCC OnLine SC 2118 में उच्च न्यायालय के एक समान आदेश को रद्द करते हुए स्पष्ट चेतावनी दी कि बिना पक्षकारों को सुने कोई भी आदेश पारित करना न्यायिक अनुशासन का उल्लंघन है। न्यायालय ने आगे कहा कि न्यायाधीशों को अपने आचरण या आदेशों से वकीलों या पक्षकारों को भयभीत नहीं करना चाहिए, क्योंकि ऐसा व्यवहार नागरिकों में न्यायालय के प्रति भय और अविश्वास पैदा करता है तथा Rule of Law (कानून के शासन) को कमजोर करता है।
इन्हीं और अन्य सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों पर भरोसा करते हुए, अधिवक्ता निलेश ओझा ने 17.09.2025 के आदेश को वापस लेने (Recall) की मांग की। उन्होंने यह भी बताया कि उसी आदेश से प्रभावित 16 अधिवक्ताओं ने अपने अधिकारों के उल्लंघन पर मुआवज़े की याचिका दायर की है। उन्होंने यह भी कहा कि मुख्य न्यायाधीश चंद्रशेखर स्वयं इस मामले में हित-संघर्ष (Conflict of Interest) की स्थिति में हैं, इसलिए वे अपने ही मामले में न्याय नहीं कर सकते (Nemo judex in causa sua) और उन्हें इस मामले से स्वयं को अलग (Recuse) करना चाहिए।
किन्तु, बंधनकारी निर्णयों पर विचार करने के बजाय, मुख्य न्यायाधीश चंद्रशेखर ने आक्रामक रुख अपनाया और अधिवक्ता को धमकी दी कि “सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों का हवाला देना और Recusal माँगना स्वयं अवमानना है, जिसके लिए तुम्हें हिरासत में लिया जाएगा।”
इसके बाद आवेदन को सर्वोच्च न्यायालय की विधि के विपरीत दृष्टिकोण अपनाते हुए खारिज कर दिया गया।
16 अक्टूबर 2025 के अपने आदेश में, मुख्य न्यायाधीश चंद्रशेखर ने यहाँ तक कहा कि —
“इस देश में कोई ऐसा कानून नहीं है जो न्यायालय को यह बाध्य करे कि वह पक्षकारों की दलीलें, प्रार्थनाएँ, निवेदन या सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों पर विचार करे।”
उन्होंने यह भी कहा कि —
“जो अधिवक्ता सुप्रीम कोर्ट के अनेक निर्णयों का हवाला देगा, उसे अवमानना का दोषी माना जाएगा और हिरासत में लिया जाएगा।”
इसके अतिरिक्त, उन्होंने Recusal आवेदन को बिना कोई कारण बताए अस्वीकार कर दिया, केवल यह लिखते हुए कि “यह प्रार्थना विचारणीय नहीं है।”
इस प्रकार सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों की अनदेखी और रिकॉर्ड पर न लाने की प्रवृत्ति अनुच्छेद 141 के अंतर्गत संवैधानिक दायित्व के उल्लंघन और न्यायिक अनुशासनहीनता (Judicial Indiscipline) का स्पष्ट उदाहरण है।
सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में दिए गए दो निर्णयों में ऐसे ही आचरण को “न्यायपालिका की अखंडता (Judicial Integrity) और जनविश्वास के लिए गंभीर खतरा” बताया है।