मेनका गांधी को आतंकवादी कसाब से भी बदतर बताए जाने और उनका मामला लड़ने पर वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचंद्रन पर जस्टिस विक्रम नाथ द्वारा की गई टिप्पणी को लेकर देशभर में छिड़ा विवाद
कई बार एसोसिएशन और मानवाधिकार संगठनों ने बार की स्वतंत्रता और नागरिकों के कानूनी अधिकारों के संविधान के मूल उद्देश्य को प्रभावित करने वाले कथित आचरण के कारण जस्टिस विक्रम नाथ को NALSA के कार्यकारी अध्यक्ष पद (Executive Chairman) से हटाने की माँग की?
विवाद क्या है?
भारत के मुख्य न्यायाधीश तथा माननीय राष्ट्रपति को एक औपचारिक शिकायत प्रस्तुत की गई है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट में खुले न्यायालय में की गई कुछ टिप्पणियों को लेकर गंभीर संवैधानिक चिंताएँ व्यक्त की गई हैं। यह शिकायत जस्टिस विक्रम नाथ तथा जस्टिस संदीप मेहता से संबंधित दो अलग-अलग मामलों में भारतीय संविधान तथा सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठों द्वारा निर्धारित बाध्यकारी निर्देशों की कथित अवहेलना के संबंध में है।
इन दो मामलों में से एक मामला पूर्व केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी से जुड़ा है, जबकि दूसरा मामला सीधे तौर पर सत्रह से अठारह वकीलों से संबंधित है। इन वकीलों में अनुसूचित जाति, पिछड़े वर्ग और अल्पसंख्यक समुदाय की महिला वकीलें भी शामिल हैं। खास बात यह है कि इस मामले में इंडियन बार एसोसिएशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष निलेश ओझा का नाम भी शामिल है। इसी वजह से यह विवाद सिर्फ किसी एक व्यक्ति तक सीमित न रहकर पूरे वकील समाज और न्याय व्यवस्था की स्वतंत्रता से जुड़ा हुआ माना जा रहा है।
यह शिकायत किसी अनुमान, अफवाह पर आधारित नहीं है, बल्कि पूरी तरह से न्यायालयीय कार्यवाही की वीडियो रिकॉर्डिंग, रिकॉर्ड पर उपलब्ध याचिकाओं तथा सुप्रीम कोर्ट की बाध्यकारी संवैधानिक मिसालों पर आधारित है।
शिकायत के अनुसार, 20 जनवरी 2026 को हुई कार्यवाही के दौरान जस्टिस विक्रम नाथ ने वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचंद्रन से यह प्रश्न किया कि उन्होंने पूर्व केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी का केस क्यों स्वीकार किया। आरोप है कि न्यायालय में उनसे आशयतः यह पूछा गया— “क्या आपने उनका पॉडकास्ट देखा है? फिर भी आपने उनका केस स्वीकार किया?”
यह सवाल इस आधार पर उठाया गया बताया गया है कि पूर्व केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी ने जस्टिस विक्रम नाथ के खिलाफ कुछ आलोचनात्मक टिप्पणियाँ की थीं। इसी को लेकर खुले न्यायालय में वरिष्ठ अधिवक्ता से सवाल किया गया। जवाब में वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचंद्रन ने साफ कहा कि अगर वे आतंकवादी अजमल कसाब का वकील बनकर उसका केस लड़ सकते हैं, तो फिर मेनका गांधी का मामला लड़ने में कोई आपत्ति क्यों होनी चाहिए।
इसके बाद जस्टिस विक्रम नाथ ने यह टिप्पणी की कि अजमल कसाब ने अवमानना का अपराध नहीं किया था। यहीं से पूरा विवाद खड़ा हो गया। शिकायत के मुताबिक, इस टिप्पणी का मतलब साफ तौर पर यह निकाला गया कि जस्टिस विक्रम नाथ के अनुसार कई निर्दोष भारतीयों की हत्या करने वाले दोषसिद्ध आतंकवादी का वकील बनना तो स्वीकार्य है, लेकिन अदालत की अवमानना के आरोपी व्यक्ति का कोई भी मामला लड़ना स्वीकार्य नहीं है।
शिकायत में स्पष्ट शब्दों में कहा गया है कि इस पूरे संवाद से एक बेहद चिंताजनक संदेश देश के सामने जाता है—मानो मेनका गांधी को आतंकवादी अजमल कसाब से भी अधिक नकारात्मक और गंभीर स्थिति में रख दिया गया हो, और अवमानना को ऐसा अपराध बताया जा रहा हो जो बड़े पैमाने पर की गई आतंकी हत्याओं से भी ज्यादा संगीन है।
शिकायतकर्ता का कहना है कि इस तरह की टिप्पणियाँ सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठों द्वारा तय किए गए बाध्यकारी दिशानिर्देशों के खिलाफ हैं, भारतीय संविधान के मूल सिद्धांतों का उल्लंघन करती हैं और संवैधानिक रूप से पूरी तरह अस्वीकार्य हैं। आरोप है कि ऐसी टिप्पणियाँ सीधे तौर पर बार की स्वतंत्रता पर हमला करती हैं और निडर व निर्भीक वकालत पर ठंडा असर डालती हैं।
भारतीय संवैधानिक कानून बार-बार यह साफ कर चुका है कि किसी अधिवक्ता से यह सवाल नहीं किया जा सकता कि वह किस मुवक्किल का प्रतिनिधित्व क्यों कर रहा है। न तो किसी वकील को नैतिक उपदेश देने का अधिकार है और न ही उसे किसी खास मामले को लेने से रोका जा सकता है—चाहे आरोप कितने ही गंभीर या अलोकप्रिय क्यों न हों। यहाँ तक कि सबसे ज्यादा नफरत झेलने वाले अभियुक्त को भी कानून के तहत वकील रखने का पूरा अधिकार है।
यही नहीं, बिना डर और बिना दबाव के बचाव करना ही कानून के राज की बुनियाद है। कोई भी न्यायिक आचरण जो अधिवक्ताओं को किसी व्यक्ति या वर्ग का प्रतिनिधित्व करने से हतोत्साहित करता है, वह सीधे-सीधे संविधान के अनुच्छेद 14, 19, 20, 21, 22(1), 39-A के तहत मिले मूल अधिकारों को कमजोर करता है। और यही वजह है कि यह मामला अब सिर्फ एक टिप्पणी तक सीमित नहीं रह गया, बल्कि देशभर में संवैधानिक बहस का विषय बन चुका है।
शिकायत में यह भी कहा गया है कि यह मामला सिर्फ एक घटना तक सीमित नहीं है, बल्कि 30 जनवरी 2026 को हुई एक और सुनवाई ने इसे और भी गंभीर बना दिया। उस दिन एक आपराधिक अवमानना अपील की सुनवाई हो रही थी, जो अधिवक्ता निलेश ओझा और सोलह अन्य वकीलों से संबंधित थी। यह अपील उस हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ थी, जिसमें इन 17 वकीलों को जज रेवती मोहिते डेरे के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप लगाने के कारण, बिना कोई मुकदमा चलाए, अवमानना का दोषी ठहरा दिया गया था। इन वकीलों में अनुसूचित जाति, पिछड़े वर्ग और अल्पसंख्यक समुदाय की महिला वकीलें भी शामिल थीं।
शिकायत के मुताबिक, इस सुनवाई के दौरान जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ से ऐसी बातें कही गईं, जिनसे यह संदेश गया कि अवमानना के मामले में अपीलकर्ता को बिना किसी मुकदमे, बिना नोटिस और बिना वकील से बचाव का मौका दिए सीधे जेल भेजा जा सकता है। इतना ही नहीं, यह भी कहा गया कि वकीलों को ऐसे व्यक्ति का केस लड़ना ही नहीं चाहिए था। शिकायत में बताया गया है कि इस पूरी सुनवाई की वीडियो रिकॉर्डिंग मौजूद है, जो यह दिखाती है कि असल में क्या हुआ।
कानून की बात करें तो देश के संवैधानिक नियमों और सुप्रीम कोर्ट की बड़ी-बड़ी पीठों द्वारा दिए गए फैसलों में यह साफ तौर पर तय किया जा चुका है कि अदालत की अवमानना भी एक आपराधिक अपराध की श्रेणी में आती है। इसका मतलब यह है कि अवमानना के किसी भी मामले में आरोपी को वही सभी अधिकार मिलते हैं, जो किसी भी दूसरे अपराध के आरोपी को मिलते हैं। इसमें कारण बताओ नोटिस (शो-कॉज नोटिस), अपने बचाव के लिए वकील रखने का अधिकार, सुनवाई का मौका और अपने पक्ष में सबूत पेश करने का अधिकार शामिल है। [ Hari Dass v. State of Punjab, AIR 1964 SC 1773; Khushi Ram v. Sheo Vati, (1953) 1 SCC 726(5-J) ; P. Mohanraj v. Shah Bros., (2021) 6 SCC 258(3-J) ; National Fertilizers Ltd. v. Tuncay Alankus, (2013) 9 SCC 600 ; Bloom v. State of Illinois, 1968 SCC OnLine US SC 93(9-J).]
सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठों और वरिष्ठ पीठों ने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि यह नियम सुप्रीम कोर्ट की हर छोटी पीठ पर भी पूरी तरह लागू होता है। अगर सुप्रीम कोर्ट की कोई छोटी पीठ—जैसे जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की दो-सदस्यीय पीठ—बड़ी तीन-सदस्यीय या उससे भी बड़ी पीठों के फैसलों को नहीं मानती, तो यह कानूनन गलत है। ऐसे मामलों में इसे स्वयं छोटी पीठ द्वारा अदालत की अवमानना माना जाता है। [ Subrata Roy Sahara v. Union of India, (2014) 8 SCC 470]
सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक स्पष्ट फैसले में यह भी कहा है कि कोई भी जज यह बहाना नहीं बना सकता कि उसे कानून की जानकारी नहीं थी। न्यायाधीश कानून से बंधे होते हैं और उन्हें वरिष्ठ पीठों द्वारा तय किए गए नियमों का पालन करना ही होता है।
शिकायत में साफ तौर पर कहा गया है कि अगर जस्टिस रेवती मोहिते डेरे के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप लगाए गए हैं और वे आरोप सीबीआई कोर्ट के आदेशों, जांच रिपोर्टों और ठोस दस्तावेज़ों से जुड़े हैं, तो कानून यह कहता है कि ऐसे आरोपों की जांच आपराधिक और अनुशासनात्मक प्रक्रिया के तहत ही होनी चाहिए। यानी मामले की निष्पक्ष जांच, कार्रवाई और जवाबदेही—तीनों अनिवार्य हैं।
इसके उलट, अगर अवमानना कानून का इस्तेमाल वकीलों को डराने, धमकाने या कथित न्यायिक भ्रष्टाचार को उजागर करने से रोकने के लिए किया जाता है, तो शिकायत के मुताबिक यह न्यायिक शक्ति का दुरुपयोग है और अवमानना अधिकार-क्षेत्र का खुला दुराचार माना जाएगा।
शिकायत एक कदम आगे बढ़कर यह भी आरोप लगाती है कि “सिस्टम का हिस्सा होते हुए एकजुट रहना चाहिए था और ऐसे खुलासे नहीं करने चाहिए थे” जैसी टिप्पणियाँ दरअसल एक आरोपी जज को जांच से बचाने की कोशिश हैं। शिकायत के मुताबिक, अदालत की अवमानना का डर दिखाकर वकीलों को चुप कराने और दबाव में लाने का प्रयास किया गया। ऐसे बयानों से साफ संकेत मिलता है कि वकीलों को डराया जा रहा था, ताकि वे सच सामने लाने से पीछे हट जाएँ और कथित भ्रष्टाचार पर आवाज न उठा सकें।
शिकायत में यह भी कहा गया है कि इस तरह का आचरण न सिर्फ न्यायपालिका पर आम जनता के भरोसे को कमजोर करता है, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 51-A के तहत नागरिकों पर डाले गए उस कर्तव्य का भी सीधा उल्लंघन करता है, जिसमें गलत काम, भ्रष्टाचार और अनियमितताओं को उजागर करना हर नागरिक की जिम्मेदारी बताया गया है। खास तौर पर वकीलों के लिए यह जिम्मेदारी और भी बड़ी मानी गई है, क्योंकि वे न्याय व्यवस्था के अधिकारी (officers of the court) होते हैं।
शिकायत में यह भी रेखांकित किया गया है कि सुप्रीम कोर्ट ने कई फैसलों में यह स्पष्ट कानून बना दिया है कि यदि किसी जज के खिलाफ भ्रष्टाचार या गंभीर अनियमितताओं के ठोस सबूत मौजूद हों, तो उसकी शिकायत करना न केवल किसी व्यक्ति का अधिकार है, बल्कि नागरिकों और वकीलों का संवैधानिक कर्तव्य भी है। ऐसे मामलों में चुप रहना या डर के कारण सच को दबाना संविधान की भावना के खिलाफ माना गया है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ कहा है कि जब ठोस सबूतों के आधार पर किसी जज के खिलाफ शिकायत की जाती है, तो उसे अवमानना या डराने-धमकाने का हथियार बनाकर दबाया नहीं जा सकता। इसके उलट, जो व्यक्ति या संस्था ऐसे खुलासों में बाधा डालती है, शिकायतकर्ताओं को धमकाती है या वकीलों को चुप कराने की कोशिश करती है, उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए।
[Nirbhay Singh Suliya v. State of Madhya Pradesh, 2026 INSC 7; Indirect Tax Practitioners’ Association v. R.K. Jain, (2010) 8 SCC 281; Subramanian Swamy v. Arun Shourie, (2014) 12 SCC 344; Bathina Ramakrishna Reddy v. State of Madras, 1952 SCR 425; R. Muthukrishnan v. High Court of Madras, (2019) 16 SCC 407; Aniruddha Bahal, 2010 (119) DRJ 102]
शिकायत के अनुसार, बार काउंसिल ऑफ इंडिया के नियम भी वकीलों को यह दायित्व देते हैं कि वे न्याय व्यवस्था की शुचिता बनाए रखें और भ्रष्टाचार या गंभीर गलतियों के खिलाफ आवाज उठाएँ। ऐसे में, वकीलों को डराकर या दबाव में लाकर शिकायत करने से रोकना न केवल पेशेवर आचार-संहिता का उल्लंघन है, बल्कि पूरे न्याय तंत्र को कमजोर करने वाला कदम है।
शिकायत में यह चेतावनी भी दी गई है कि अगर जजों के खिलाफ ठोस सबूत होने के बावजूद शिकायत करने वालों को ही निशाना बनाया जाएगा, तो इसका असर सिर्फ वकीलों तक सीमित नहीं रहेगा। इससे आम नागरिकों को यह संदेश जाएगा कि ताकतवर लोगों के खिलाफ सच बोलने की कोई जगह नहीं है, और यही स्थिति लोकतंत्र और कानून के राज के लिए सबसे बड़ा खतरा बन जाती है।
शिकायत यह भी साफ करती है कि सुप्रीम कोर्ट के तय कानून के अनुसार—खासतौर पर निर्भय सिंह सुलिया बनाम मध्य प्रदेश राज्य (2026 INSC 7) में दिए गए फैसले के मुताबिक—अगर जस्टिस रेवती मोहिते डेरे के खिलाफ लगाए गए भ्रष्टाचार के आरोप झूठे, निराधार या बिना सबूत के हों, तो ऐसे आरोप लगाने वाले वकीलों के खिलाफ अवमानना, झूठी गवाही (परजरी) और बार काउंसिल की अनुशासनात्मक कार्रवाई की जा सकती है।
लेकिन कानून का दूसरा और उतना ही अहम पक्ष यह भी है कि अगर ये आरोप सही हों और रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों से साबित होते हों, तो अदालत पर यह कानूनी जिम्मेदारी बनती है कि वह संबंधित जज के खिलाफ कानून के मुताबिक कार्रवाई करे। शिकायत के मुताबिक, कानून दोनों ही स्थितियों में बराबर और निष्पक्ष रूप से लागू होना चाहिए।
शिकायत में यह भी जोर देकर कहा गया है कि जब तक आरोपों की सच्चाई की जांच नहीं हो जाती, तब तक शिकायतकर्ताओं और वकीलों को अवमानना कानून के नाम पर डराया, धमकाया या चुप नहीं कराया जा सकता। ऐसा करना न सिर्फ अवमानना कानून का गलत इस्तेमाल है, बल्कि न्याय के उद्देश्य को भी नुकसान पहुंचाता है और उस संवैधानिक कर्तव्य को कमजोर करता है, जिसके तहत भ्रष्टाचार और गलत काम को उजागर करना जरूरी माना गया है—खासकर तब, जब आरोप गंभीर हों और उनके समर्थन में विश्वसनीय सबूत मौजूद हों।
इसका सबसे बड़ा नुकसान आम नागरिकों को होता है—खासतौर पर महिला कार्यकर्ताओं, असहमति रखने वालों और हाशिए पर खड़े लोगों को—क्योंकि जब वकील डरेंगे, तो उन्हें प्रभावी न्याय मिलना भी मुश्किल हो जाएगा।