जूनियर एडवोकेट्स एंड लॉ स्टूडेंट्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (JALSAI) ने निवृत्त न्यायमूर्ति अभय ओका के खिलाफ बहिष्कार की घोषणा की है। आरोप है कि उनके न्यायिक कार्यकाल के दौरान न्यायालयीन आदेशों का एक लगातार पैटर्न रहा, जो स्वतंत्र, निर्भीक और निष्पक्ष वकालत को धमकाने वाला और कमजोर करने वाला था, तथा न्यायालयीन कार्यवाही में भ्रष्टाचार और अप्रामाणिकता को बढ़ावा देने वाला था।
हाल ही में, सर्वोच्च न्यायालय के बड़े खंडपीठ ने उस निर्णय को रद्द कर दिया, जो न्यायमूर्ति अभय ओका ने सर्वोच्च न्यायालय के बाध्यकारी पूर्वनिर्णयों के विपरीत दिया था। [Confederation of Real Estate Developers of India v. Vanashakti, 2025 SCC OnLine SC 2474]
नई दिल्ली: जूनियर एडवोकेट्स एंड लॉ स्टूडेंट्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (JALSAI) ने सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति अभय ओक के विरुद्ध बहिष्कार की औपचारिक घोषणा की है। एसोसिएशन के अनुसार यह निर्णय उनके न्यायिक कार्यकाल के दौरान सामने आए ऐसे निर्णयों एवं न्यायालयीन रुख के आधार पर लिया गया है, जिन्हें बार की स्वतंत्रता, निष्पक्ष न्याय प्रक्रिया और संविधान प्रदत्त अभिव्यक्ति के अधिकार के प्रतिकूल माना गया है। जिसने स्वतंत्र, निर्भीक और निष्पक्ष वकालत को कमजोर किया, प्रामाणिक शिकायतें दर्ज कराने से वकीलों और पक्षकारों को रोका और न्यायालयीन प्रक्रियाओं में भ्रष्टाचार और अप्रामाणिकता के खिलाफ स्थापित सुरक्षा तंत्र को कमजोर किया।
JALSAI का कहना है कि न्यायपालिका में आलोचना और जवाबदेही को अवमानना की आड़ में दबाने की प्रवृत्ति लोकतांत्रिक व्यवस्था और न्याय के मूल सिद्धांतों के लिए घातक है। एसोसिएशन ने स्पष्ट किया कि यह बहिष्कार किसी व्यक्तिगत दुर्भावना से नहीं, बल्कि संस्थागत सुधार और न्यायिक उत्तरदायित्व की माँग के तहत घोषित किया गया है।
एसोसिएशन ने देशभर के अधिवक्ताओं, विधि छात्रों और बार संगठनों से इस विषय पर गंभीर विमर्श करने और न्यायपालिका में पारदर्शिता व जवाबदेही को सुदृढ़ करने की अपील की है।
असोसिएशन ने आरोप लगाया कि न्यायमूर्ति ओका द्वारा दिए गए कुछ आदेश स्वतंत्र और निर्भीक वकालत को सीमित करने वाले, गैरकानूनी कार्यों को अप्रत्यक्ष संरक्षण देने वाले और न्यायप्रक्रिया में पारदर्शिता व जवाबदेही को कम करने वाले रहे। ये आक्षेप व्यक्तिगत नहीं हैं, बल्कि न्यायालयीन रिकॉर्ड और सर्वोच्च न्यायालय के बड़े खंडपीठ के बाध्यकारी पूर्वनिर्णयों पर आधारित हैं। असोसिएशन का दावा है कि न्यायमूर्ति ओका ने इन पूर्वनिर्णयों की जानबूझकर अनदेखी की। असोसिएशन ने स्पष्ट किया कि उनकी भूमिका व्यक्तिगत आलोचना पर नहीं, बल्कि गहन कानूनी विश्लेषण पर आधारित है।
इस दृष्टिकोण का समर्थन करते हुए, असोसिएशन ने तीन प्रमुख मामलों का उल्लेख किया है।
पहला, न्यायाधीशों के कथित अन्यायपूर्ण, मनमाने और खुले तौर पर गैरकानूनी आचरण पर प्रश्न उठाने वाले अधिवक्ताओं को ही न्यायमूर्ति अभय ओका द्वारा कटघरे में खड़ा किए जाने का गंभीर आरोप लगाया गया है। न्याय के पक्ष में आवाज़ उठाने वाले अधिवक्ताओं को अवमानना कार्यवाही के नोटिस जारी कर भयभीत करने, धमकाने और चुप कराने का प्रयास किए जाने की बात कही गई है।
एसोसिएशन का कहना है कि सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठों ने स्पष्ट रूप से स्थापित किया है कि अधिवक्ताओं एवं नागरिकों द्वारा न्यायाधीशों के अन्यायपूर्ण और गैरकानूनी आचरण के विरुद्ध की गई वैध आलोचना और औपचारिक शिकायतों को दबाने के लिए अवमानना अधिकार का प्रयोग नहीं किया जा सकता। ऐसी शिकायतें दर्ज करना बार काउंसिल ऑफ इंडिया के नियमों के अनुसार प्रत्येक अधिवक्ता का कर्तव्य है, वहीं भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51-A के अंतर्गत यह प्रत्येक नागरिक का भी मौलिक कर्तव्य है। इसके बावजूद, आरोप है कि इन स्पष्ट रूप से निर्धारित संवैधानिक सीमाओं की जानबूझकर अनदेखी करते हुए न्यायमूर्ति अभय ओका द्वारा ठीक इसके विपरीत रुख अपनाया गया।
दूसरा, वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे बनाम शरद पवार मामले में एफआईआर दर्ज करने और प्रकरण को सीबीआई को सौंपने से इंकार कर दिया गया। आरोप है कि स्थापित कानून और सर्वोच्च न्यायालय के बाध्यकारी पूर्वनिर्णयों को दरकिनार करते हुए हजारों करोड़ रुपये की सार्वजनिक निधि से जुड़े कथित महाभ्रष्टाचार के पर्दाफाश को रोका गया। एसोसिएशन का कहना है कि न्यायमूर्ति ओका के इस रुख से न केवल जनहित याचिकाओं की प्रभावशीलता को कमजोर किया गया, बल्कि आम नागरिकों को जनहित से जुड़े मुद्दों पर आवाज़ उठाने से हतोत्साहित और हाशिये पर धकेलने का प्रयास किया गया—जिससे भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई को ही कमजोर कर दिया गया।
तीसरा, झूठे हलफनामे से जुड़े मामलों में जहाँ कानून स्पष्ट रूप से झूठे शपथपत्र दाखिल करने वाले बेईमान पक्षकारों के विरुद्ध प्रतिज्ञाभंग (परजरी) पर तत्काल, कठोर और दंडात्मक कार्रवाई की मांग करता है, वहाँ न्यायमूर्ति ओका द्वारा जानबूझकर निष्क्रियता बरते जाने का गंभीर आरोप लगाया गया है। एसोसिएशन का कहना है कि समय रहते कानून के अनुसार कार्रवाई करने के बजाय ऐसे आदेश पारित किए गए, जिनसे अप्रामाणिक और बेईमान पक्षकारों को झूठे हलफनामे दाखिल कर न्यायालयीन प्रक्रिया को जानबूझकर लंबा खींचने का अप्रत्यक्ष और अवैध संरक्षण मिल गया। आरोप है कि इस प्रकार के आदेश न केवल न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता और गरिमा को गहरी चोट पहुँचाते हैं, बल्कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा वर्षों में स्थापित स्पष्ट, बाध्यकारी और निर्विवाद कानूनी सिद्धांतों के सीधे और खुले उल्लंघन के समान हैं।
अधिवक्ताओं के विरुद्ध अवैध अवमानना कार्यवाही के आरोप; निर्भीक वकालत पर प्रहार
एसोसिएशन ने न्यायमूर्ति ओका पर अवैध अवमानना कार्यवाही के माध्यम से अधिवक्ताओं के बीच भय का वातावरण पैदा करने का गंभीर आरोप लगाया है। इस संदर्भ में Municipal Council, Tikamgarh बनाम Matsya Udyog Sahkari Samiti, 2022 SCC OnLine SC 1900 के निर्णय की ओर विशेष रूप से ध्यान आकृष्ट किया गया है। इस मामले में पंजीकृत अधिवक्ताओं, वरिष्ठ अधिवक्ताओं तथा याचिकाकर्ता को अवमानना के संबंध में कारण बताओ नोटिस जारी किए गए थे।
आरोप है कि याचिका में उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश के कथित दुराचार के आरोप लगाए गए थे, किंतु उन आरोपों की सत्यता या असत्यता की कोई भी प्राथमिक जांच किए बिना, मात्र उसी आधार पर अवमानना नोटिस जारी कर दिए गए। एसोसिएशन का कहना है कि यह प्रक्रिया स्थापित कानून और न्यायिक सिद्धांतों के विपरीत है।
एसोसिएशन के अनुसार, याचिका में अभिलेख पर उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर किए गए कथनों को ‘स्कैंडलस’ (अपमानजनक) करार देना, सर्वोच्च न्यायालय के बाध्यकारी पूर्वनिर्णयों तथा संविधान और अवमानना कानून पर विकसित न्यायशास्त्र के सीधे विरोध में है। इस दावे के समर्थन में Indirect Tax Practitioners’ Association बनाम R.K. Jain, (2011) 8 SCC 281 सहित अनेक प्रामाणिक निर्णयों का हवाला दिया गया है, जिनमें प्रमुख रूप से निम्नलिखित शामिल हैं—
- Subramanian Swamy बनाम Arun Shourie, (2014) 12 SCC 344 (संविधान पीठ)
- Bathina Ramakrishna Reddy बनाम State of Madras, 1952 SCR 425 (संविधान पीठ)
- In re: C.S. Karnan, (2017) 7 SCC 1
- S.R. Ramraj बनाम Special Court, Bombay, (2003) 7 SCC 175
- Nirbhay Singh Suliya बनाम State of Madhya Pradesh, (2026 INSC 7)
- Suo Motu बनाम Mahavir Sampatrai Parmar, 2015 SCC OnLine Guj 6300
- Craig बनाम Harney, 1947 SCC OnLine US SC 79 (अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट, नौ-न्यायाधीशीय पीठ)
इन बाध्यकारी पूर्वनिर्णयों के अनुसार, पर्याप्त साक्ष्यों के आधार पर और विधिक राहत प्राप्त करने के उद्देश्य से सद्भावना में किए गए सत्य-आधारित कथन अवमानना नहीं माने जा सकते। सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि ऐसे आरोपों पर अवमानना कार्यवाही प्रारंभ करने से पहले न्यायालय का यह संवैधानिक दायित्व है कि वह प्रथम दृष्टया यह जांच करे कि आरोप असत्य हैं या नहीं।
संविधान पीठों ने यह भी स्पष्ट रूप से प्रतिपादित किया है कि न्यायालयीन दुराचार को उजागर करने वाली सत्य और तथ्यपरक घटनाओं का प्रकाशन व्यापक जनहित के अंतर्गत आता है और उसे न्यायालय की अवमानना नहीं माना जा सकता। अवमानना का प्रश्न केवल उसी स्थिति में उत्पन्न होता है, जब लगाए गए आरोप असत्य, मनगढ़ंत अथवा दुर्भावनापूर्ण पाए जाएँ।
हाल के निर्णय Nirbhay Singh Suliya बनाम State of Madhya Pradesh (2026 INSC 7) में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट रूप से दोहराया है कि यदि किसी न्यायाधीश के विरुद्ध लगाए गए आरोप सत्य सिद्ध होते हैं, तो संबंधित न्यायाधीश के विरुद्ध अनुशासनात्मक ही नहीं, बल्कि आपराधिक कार्रवाई के भी निर्देश दिए जाने चाहिए। इसके विपरीत, केवल तभी—जब ऐसे आरोप झूठे, निराधार या द्वेषपूर्ण पाए जाएँ—शिकायतकर्ता अथवा संबंधित अधिवक्ताओं के विरुद्ध अवमानना कानून के तहत कार्रवाई की जा सकती है।
सर्वोच्च न्यायालय ने यह रेखांकित किया है कि अधिवक्ता न्यायालय के अधिकारी होते हैं और उन्हें सम्मान, स्वतंत्रता तथा निर्भीक रूप से अपने व्यावसायिक कर्तव्यों का निर्वहन करने हेतु आवश्यक स्वतंत्रता प्राप्त होना उनका संवैधानिक अधिकार है। अवमानना कार्यवाही की धमकी देकर अधिवक्ताओं को भयभीत करने वाली कोई भी न्यायालयीन कार्रवाई संवैधानिक वकालत पर चिलिंग इफेक्ट (प्रतिबंधक प्रभाव) उत्पन्न कर सकती है। अधिवक्ताओं को उनके पेशेवर कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान धमकाना, अपने आप में अवमानना अधिकार का दुरुपयोग है, और ऐसी कार्रवाई करने वाला न्यायाधीश भी कानून के तहत दंडात्मक कार्रवाई के लिए उत्तरदायी ठहराया जा सकता है।
एसोसिएशन के अनुसार, अधिवक्ताओं को उनके विधिक कर्तव्यों से विमुख करने के उद्देश्य से किसी भी प्रकार की धमकी दिए जाने की स्थिति में संबंधित न्यायाधीश भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 166, 218 और 219 के साथ-साथ अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 2(क), 12 एवं 16 के अंतर्गत कार्रवाई और दंड का पात्र हो सकता है।
अधिवक्ता से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह किसी के समक्ष दासवत या लाचारीपूर्ण आचरण अपनाए। यदि किसी न्यायिक अधिकारी के विरुद्ध गंभीर प्रकृति की शिकायत के लिए उचित, ठोस और विश्वसनीय आधार मौजूद हों, तो ऐसी शिकायत को सक्षम और उपयुक्त प्राधिकरण के समक्ष प्रस्तुत करना अधिवक्ता का केवल अधिकार ही नहीं, बल्कि उसका विधिक और नैतिक कर्तव्य भी है।
सर्वोच्च न्यायालय ने अनेक बाध्यकारी निर्णयों में स्पष्ट चेतावनी दी है कि अधिवक्ताओं को भय, चापलूसी या अधीनता की स्थिति में धकेलना न केवल अस्वीकार्य है, बल्कि यह न्याय व्यवस्था के निष्पक्ष, स्वतंत्र और न्यायपूर्ण प्रशासन के लिए भी घातक सिद्ध होता है। [Latief Ahmad Rather v. Shafeeqa Bhat, 2022 SCC OnLine J&K 249 ; Ghanshyam Upadhyay v. State of Maharashtra, 2017 SCC OnLine Bom 9984; Arnab Ranjan Goswami v. Maharashtra State Legislative Assembly, 2020 SCC OnLine SC 1100; H. Syama Sundara Rao v. Union of India, 2006 SCC OnLine Del 1392; Jai Chaitanya Dasa, 2015 SCC OnLine Kar 549; and Court on Its Own Motion v. DSP Jayant Kashmiri, 2017 SCC OnLine Del 7387, Harish Chandra Mishra v. Hon’ble Mr. Justice S. Ali Ahmed, 1985 SCC OnLine Pat 213; R. Muthukrishnan v. High Court of Madras, (2019) 16 SCC 407; Chetak Construction Ltd. v. Om Prakash, (1998) 4 SCC 577, Muhammad Shafi v. Choudhary Qadir Bakhsh, 1949 SCC OnLine Lah 14, Neeraj Garg v. Sarita Rani, (2021) 9 SCC 92, Dushyant Mainali v. Diwan Singh Bora, 2024 SCC OnLine SC 5178.]
सामाजिक कार्यकर्ता अण्णा हजारे प्रकरण
अपनी भूमिका के समर्थन में एसोसिएशन ने एक महत्वपूर्ण उदाहरण के रूप में वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता श्री अण्णा हजारे द्वारा दाखिल रिट याचिका का उल्लेख किया है। इस याचिका में हजारों करोड़ रुपये के बड़े भ्रष्टाचार के आरोप लगाए गए थे और इसके संदर्भ में एफआईआर दर्ज करने का आदेश जारी करने की मांग की गई थी (रिट याचिका क्र. 46/2016)।
यह मामला न्यायमूर्ति अभय ओका की अध्यक्षता वाले खंडपीठ के समक्ष आया। Noida Entrepreneurs Association v. Noida (2011) 6 SCC 508 और उसके बाद के कई सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों के अनुसार, ऐसे गंभीर आरोपों वाली रिट याचिका को एफआईआर के रूप में मानते हुए, परिस्थितियों के अनुसार सीबीआई या अन्य सक्षम जांच एजेंसी के माध्यम से जांच करना अपेक्षित था।
हालांकि, 6 जनवरी 2017 के आदेश में न्यायालय ने श्री अण्णा हजारे को पहले पुलिस यंत्रणा के पास जाने और उसके बाद ही उच्च न्यायालय में न्याय माँगने के निर्देश दिए। एसोसिएशन का कहना है कि यह दृष्टिकोण सुप्रीम कोर्ट के बाध्यकारी न्यायनिर्णयों के विपरीत था और जनहित याचिकाओं में उठाए गए गंभीर भ्रष्टाचार के आरोपों पर कार्रवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्थापित निश्चित प्रक्रिया से स्पष्ट विचलन था।
असोसिएशन ने आरोप लगाया है कि ऐसे आदेश से सामाजिक कार्यकर्ताओं और व्हिसलब्लोअर्स का मनोबल गिरता है और उच्चस्तरीय भ्रष्टाचार के मामलों में सामान्य नागरिकों द्वारा न्याय व्यवस्था के प्रति विश्वास हिल जाता है।
झूठे शपथपत्र बढ़ावा देने वाले और न्याय प्रणाली को कमजोर करने वाले आदेश
एसोसिएशन ने न्यायमूर्ति अभय ओका के निर्णय प्रक्रिया पर गंभीर आपत्ति जताई है, विशेष रूप से Dr. Santosh Chandrashekar Shetty v. Ameeta Santosh Shetty, 2019 SCC OnLine Bom 99 मामले में। इस मामले में विवादित वादी ने झूठे (Zoothe) शपथपत्रों के आधार पर प्रतिवादी को परेशान किया था। न्यायमूर्ति अभय ओका ने आदेश दिया कि शपथभंग (perjury) याचिका को मुख्य कार्यवाही पूरी होने तक स्थगित रखा जाए और शपथभंग का प्रारंभिक प्रमाण मिलने के बावजूद तत्काल कार्रवाई करना आवश्यक नहीं है।
इस विषय पर कानून सर्वोच्च न्यायालय के कई अधिकारयुक्त निर्णयों द्वारा स्पष्ट किया गया है। इन बाध्यकारी निर्णयों के अनुसार, प्रामाणिक नहीं होने वाले और झूठ बोलने वाले (Zoothe) वादी के खिलाफ तत्काल और कठोर कार्रवाई करना अनिवार्य है। सर्वोच्च न्यायालय ने बार-बार स्पष्ट किया है कि जहाँ दावे का मूल तत्व झूठा (Zoothe) पाया जाता है, ऐसे वादी को न्यायालय में सुनवाई का अधिकार नहीं है और उन्हें न्यायालय में बोलने का भी अधिकार नहीं दिया जाना चाहिए।
इस संदर्भ में निम्नलिखित निर्णयों का हवाला लिया जा सकता है:
Kishore Samrite v. State of U.P., (2013) 2 SCC 398;K.D. Sharma v. SAIL, (2008) 12 SCC 481;H.S. Bedi v. National Highway Authority of India, 2016 SCC OnLine Del 432;New Delhi Municipal Council v. Prominent Hotels, 2015 SCC OnLine Del 11910;Perumal v. Janaki (2014) SCC (Cri) 591।.
सुप्रीम कोर्ट के संविधान पीठ ने Iqbal Singh Marwah v. Meenakshi Marwah, (2005) 4 SCC 370 para 32 में स्पष्ट किया है कि शपथभंग से संबंधित फौजदारी कार्रवाई तत्काल शुरू की जानी चाहिए, इसे मुख्य कार्यवाही से प्राथमिकता दी जानी चाहिए और इस फौजदारी कार्रवाई के पूरा होने तक संबंधित दीवानी प्रकरण स्थगित किए जा सकते हैं। इसी तरह Gulab Chaturkar v. Vimalbai, 2022 SCC OnLine Bom 11964 और Praveen R. v. Arpitha, 2021 SCC OnLine Kar 15703 में भी यही सिद्धांत अपनाया गया।
हालांकि, Dr. Santosh Chandrashekar Shetty v. Ameeta Santosh Shetty मामले में न्यायमूर्ति ओका ने इस स्थापित सिद्धांत से विचलित होकर यह निर्णय लिया कि शपथभंग (perjury) याचिका केवल मुख्य कार्यवाही समाप्त होने के बाद ही देखी जाए। इस दृष्टिकोण के कारण प्रामाणिक नहीं (Zoothe) वादी को वर्षों तक न्याय प्रक्रिया का दुरुपयोग करने का अवसर मिलता है, प्रामाणिक वादी को अनावश्यक परेशानी होती है और न्यायालयों पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है। परिणामस्वरूप न्यायव्यवस्था की निष्पक्ष, तत्पर और तेज़ कार्यवाही पर गंभीर प्रभाव पड़ता है।
न्यायमूर्ति अभय ओका का यह मत उस समय कानूनी दृष्टि से गलत और per incuriam था, और बाद में सर्वोच्च न्यायालय के बाध्यकारी निर्णयों के प्रकाश में अप्रत्यक्ष रूप से रद्द कर दिया गया। Sarvepalli Radhakrishnan University v. Union of India, (2019) 14 SCC 761 में वरिष्ठ पीठ ने मुख्य प्रकरण की सुनवाई से पहले ही झूठे (Zoothe) शपथपत्रों के आरोपों पर, सीबीआई सहित विशेष समिति के माध्यम से रिपोर्ट मंगवाने और उसके आधार पर प्रामाणिक न होने वाले वादी के खिलाफ फौजदारी कार्रवाई निर्देशित करने का उदाहरण प्रस्तुत किया।
यह स्पष्ट रूप से न्यायमूर्ति अभय ओका की गलत मानसिकता और प्रक्रिया संबंधी दृष्टिकोण को उजागर करता है, जिससे यह प्रतीत होता है कि उन्होंने न्याय प्रक्रिया की प्रामाणिकता और तत्परता की मूलभूत आवश्यकता को नजरअंदाज किया।