सभी पुलिस व सरकारी अधिकारियों को सुप्रीम कोर्ट का कड़ा झटका — अंतिम चेतावनी जारी; कठोर कानून लागू — नागरिकों की शिकायत न सुनने वाले, झूठ बोलकर कोर्ट को गुमराह करने वाले अधिकारी अब होंगे व्यक्तिगत सजा के पात्र
लोकतंत्र के वास्तविक स्वामी “जनता” के साथ अमानवीय, उपेक्षापूर्ण और दमनकारी व्यवहार करने वाले, तथा स्वयं को संविधान, कानून और नागरिकों से ऊपर समझ कर मनमानी करने वाले सभी सरकारी और अर्ध–सरकारी अधिकारियों के लिए सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक और निर्णायक चेतावनी जारी की है। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि अब ऐसे प्रत्येक अधिकारी को उसके व्यक्तिगत आचरण के लिए प्रत्यक्ष रूप से जिम्मेदार ठहराया जाएगा और उसके कृत्यों के अनुरूप दंड दिया जाएगा। इंडियन बार एसोसिएशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष अधिवक्ता नीलेश ओझा ने इस निर्णय का स्वागत करते हुए इसे “नागरिकों की गरिमा और न्यायिक व्यवस्था की प्रतिष्ठा” को सुदृढ़ करने वाला महत्वपूर्ण कदम बताया है।
28 नवंबर 2025 को न्यायमूर्ति जे.बी. पारडीवाला और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की खंडपीठ द्वारा Hindustan Construction Company Ltd. v. Bihar Rajya Pul Nirman Nigam Ltd., 2025 LiveLaw (SC) 1153 में सुनाए गए आदेश में Urban Improvement Trust, Bikaner v. Mohan Lal, (2010) 1 SCC 512 का उद्धरण देते हुए यह दोहराया गया कि जब कोई नागरिक अपनी शिकायत या समस्या लेकर किसी सरकारी अधिकारी के समक्ष पहुँचता है, तब उस अधिकारी का पहला और सर्वोच्च कर्तव्य है कि वह शिकायत को धैर्यपूर्वक सुने, समझे और निष्पक्ष, त्वरित तथा न्यायपूर्ण निर्णय दे। परंतु वास्तविकता यह है कि कई अधिकारी अपने पद की शक्ति का गलत उपयोग करते हुए नागरिकों की शिकायतें अनसुनी कर देते हैं, फाइलें जानबूझकर लंबित रखी जाती हैं, कोई उत्तर नहीं दिया जाता, और जब वही नागरिक न्यायालय की शरण लेता है, तब वही अधिकारी तकनीकी, झूठे और गैरकानूनी तर्क देकर उसके वैध अधिकारों का विरोध करने लगते हैं।
सुप्रीम कोर्ट और देश के कई उच्च न्यायालयों ने वर्षों से ऐसी लापरवाही, भ्रष्ट प्रवृत्तियों और असंवेदनशील रवैये पर कठोर टिप्पणियाँ की हैं, परंतु कानून की अनदेखी और जवाबदेही तय न होने के कारण अधिकारियों की मनमानी थमने का नाम नहीं ले रही थी। इसी पृष्ठभूमि में सुप्रीम कोर्ट ने अब यह साफ संदेश दे दिया है कि शिकायत न सुनने, नागरिकों के अधिकारों का दमन करने, न्यायालय में झूठ बोलने, फर्जी तकनीकी आपत्तियाँ उठाने, निर्दोषों को फँसाने या दोषियों को बचाने जैसी किसी भी हरकत पर अधिकारी “व्यक्तिगत रूप से” उत्तरदायी होगा।
सुप्रीम कोर्ट अनेक पूर्ववर्ती निर्णयों में यह स्पष्ट कर चुका है कि यदि कोई अधिकारी सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित दिशानिर्देशों की अवहेलना करता है, तो वह सिविल कंटेम्प्ट की धारा 2(b) और 12 के तहत छह महीने तक के कारावास, व्यक्तिगत आर्थिक दंड, निलंबन, पदावनति, सेवा से बर्खास्तगी तथा पीड़ित नागरिक को मुआवज़ा दिलाने हेतु वेतन से राशि वसूलने जैसी कठोर सज़ाओं का पात्र होगा। अदालत ने यह भी रेखांकित किया है कि अधिकारियों का गलत आचरण केवल अवमानना तक सीमित नहीं माना जाएगा, बल्कि यदि कोई अधिकारी अपने पद का दुरुपयोग करके निर्दोषों को फँसाने, दोषियों को अनुचित संरक्षण देने, या किसी पक्ष को अवैध लाभ पहुँचाने का प्रयास करता है, तो उसके विरुद्ध भारतीय दंड संहिता की गंभीर धाराओं—जैसे धारा 166, 192, 193, 167, 211, 220, 219, 409 (जिसमें आजीवन कारावास तक की सज़ा है), 120-B, 107, 109, 34—के तहत आपराधिक मुकदमे दर्ज करना न केवल संभव बल्कि अनिवार्य होगा।
इन सभी धाराओं के अंतर्गत सात वर्ष से लेकर आजीवन कारावास तक की कठोर सज़ाएँ निर्धारित हैं। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि इस जिम्मेदारी और दंडात्मक प्रावधान से कोई भी अधिकारी—चाहे वह न्यायिक अधिकारी हो, पुलिस अधिकारी, जिला कलेक्टर, विभागीय सचिव, वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी या मंत्री—बच नहीं सकता। प्रत्येक अधिकारी को यह समझना होगा कि शासन–सत्ता का अधिकार जनता से प्राप्त होता है और उसकी पहली तथा सर्वोच्च जवाबदेही भी जनता, संविधान और कानून के प्रति ही है।
सुप्रीम कोर्ट अनेक पूर्ववर्ती निर्णयों में यह स्पष्ट, दो-टूक और निर्विवाद रूप से घोषित कर चुका है कि यदि कोई अधिकारी सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित संवैधानिक दिशानिर्देशों, वैधानिक दायित्वों और अनिवार्य प्रक्रियाओं की अवहेलना करता है, तो उसका ऐसा आचरण केवल त्रुटि नहीं बल्कि दंडनीय अवमानना माना जाएगा। ऐसे अधिकारी पर सिविल कंटेम्प्ट की धारा 2(b) एवं 12 के अंतर्गत व्यक्तिगत रूप से कठोर कार्रवाई की जाएगी, जिसमें छह महीने तक का कारावास, भारी आर्थिक दंड, अनिवार्य निलंबन, पदावनति, सेवा से बर्खास्तगी, और पीड़ित नागरिक को क्षतिपूर्ति दिलाने हेतु उसके वेतन तथा अन्य लाभों से राशि की वसूली—सभी शामिल हैं। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया है कि अधिकारी की यह व्यक्तिगत जवाबदेही किसी भी बहाने, पद, प्रभाव या विभागीय सुरक्षा के कारण समाप्त नहीं होती।
अदालत ने यह भी विशेष रूप से रेखांकित किया है कि अधिकारियों का गलत, मनमाना या दुरुपयोगपूर्ण आचरण केवल अवमानना तक सीमित मानकर नहीं छोड़ा जा सकता। यदि कोई अधिकारी अपने पद के अधिकार का दुरुपयोग करते हुए निर्दोष नागरिकों को झूठे मामलों में फँसाता है, वास्तविक दोषियों को अनुचित संरक्षण देता है, किसी पक्षकार को गैरकानूनी लाभ पहुँचाता है, या न्याय-प्रक्रिया को मोड़ने का प्रयास करता है—तो उसका आचरण सीधे-सीधे भारतीय दंड संहिता की गंभीर, कठोर और दंडनीय धाराओं के दायरे में आता है। इन धाराओं में धारा 166 (कानून के उल्लंघन से पद के दुरुपयोग), 192 और 193 (झूठा साक्ष्य तैयार करना और देना), 167 (दस्तावेजों या रिकॉर्ड में गलत प्रविष्टि), 211 (झूठा आरोप लगाना), 220 और 219 (अवैध हिरासत व न्याय में बाधा), 409 (सरकारी संपत्ति या विश्वास का आपराधिक दुरुपयोग—जिसमें आजीवन कारावास तक की सज़ा है), तथा 120-B, 107, 109 और 34 जैसे षड्यंत्र, उकसावे और सामूहिक दायित्व की धाराएँ शामिल हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर विशेष जोर दिया है कि इन धाराओं के अंतर्गत आपराधिक मुकदमा दर्ज करना न केवल संभव है बल्कि ‘अनिवार्य’ है, और न्यायालय के पास विवेकाधिकार नहीं कि ऐसे गंभीर आचरण को अनदेखा या क्षमा कर दे। प्रत्येक अधिकारी को यह समझ लेना चाहिए कि कानून का पालन न करने का अर्थ केवल विभागीय उल्लंघन नहीं बल्कि संज्ञेय अपराध है, जिसके लिए 7 वर्ष से लेकर आजीवन कारावास तक की कठोर सज़ा दी जा सकती है।
सुप्रीम कोर्ट अनेक निर्णयों में यह unequivocally स्पष्ट कर चुका है कि यह कानून किसी एक विभाग, श्रेणी या पद-स्तर तक सीमित नहीं है, बल्कि शासन–प्रशासन की संपूर्ण संरचना पर समान रूप से लागू होता है। कलेक्टर, जिला मजिस्ट्रेट, विभागीय सचिव, वरिष्ठ नौकरशाह, पुलिस अधिकारी, मंत्री, और यहाँ तक कि अधिवक्ता, न्यायिक अधिकारी तथा न्यायाधीश—सभी इस वैधानिक दायित्व और जवाबदेही के दायरे में आते हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया है कि पद, प्रभाव, वरिष्ठता या संवैधानिक हैसियत किसी को भी कानून के दंडात्मक प्रविधान से प्रतिरक्षित नहीं करती।
यदि कोई भी अधिकारी, किसी भी स्तर पर, कानून का उल्लंघन करता है, अपने पद का दुरुपयोग करता है, या नागरिकों के संवैधानिक और वैधानिक अधिकारों का दमन करता है, तो वह अवमानना, दंडात्मक कार्यवाही, कठोर सज़ाओं और व्यक्तिगत उत्तरदायित्व—इन सभी का पूर्णतः पात्र और उत्तरदायी होता है। सर्वोच्च न्यायालय ने बार-बार यह दोहराया है कि ‘कानून के सामने सभी समान हैं’ और यह समानता केवल सिद्धांत नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष और अनिवार्य दायित्व है। प्रत्येक अधिकारी को अपने आचरण और निर्णयों का व्यक्तिगत हिसाब देना होगा, और किसी भी प्रकार की शक्ति या पद इस जवाबदेही से मुक्ति नहीं दिला सकते।
ऐसे दोषी अधिकारियों के खिलाफ कारवाही के कानून निम्नलिखित आदेशों में वास्तु रूप से दिए हैं:-
(i) Tata Mohan Rao v. S. Venkateswarlu, 2025 SCC OnLine SC 1105
(ii) Priya Gupta v. Ministry of Health & Family Welfare, (2013) 11 SCC 404
(iii) Harish Arora v. Registrar of Coop. Societies, 2025 SCC OnLine Bom 2833
(iv) Shreyash Pradip Dange v. State of Maharashtra, 2018 SCC OnLine Bom 21510
(v) Shreyash Pradip Dange v. State of Maharashtra, 2018 SCC OnLine Bom 21509.
(vi) Garware Polyester Ltd. v. State of Maharashtra, 2010 SCC OnLine Bom 2223
(vii) New Delhi Municipal Council Vs. Prominent Hotel, 2015 SCC OnLine Del 11910
(viii) Re M.P. Dwivedi, (1996) 4 SCC 152
(ix) Baradakanta Misra v. Bhimsen Dixit, (1973) 1 SCC 446
(x) Directions in the Matter of Demolition of Structures, In re, (2025) 5 SCC 1
(xi) Mahabir v. State of Haryana, 2025 SCC OnLine SC 184
(xii) K. P. Tamilraman Vs State 2025 SCC On Line SC 958.
(xiii) Salma Babu Shaikh v. State of Maharashtra MANU/MH/1864/2008
(xiv) Rini Johar v. State of M.P., (2016) 11 SCC 703
(xv) Kodali Purnachandra Rao v. Public Prosecutor, (1975) 2 SCC 570.
(xvi) Smt. Prabha Sharma Vs. Sunil Goyal and Ors. (2017) 11 SCC 77;
(xvii) Superintendent of Central Excise Vs. Somabhai Ranchhodhbhai Patel AIR 2001 SC 1975,
(xviii) Afzal Vs State of Haryana (1996) 7 SCC 397.
(xix) Ramesh Lawrence Maharaj v. Attorney General of Trinidad and Tobago, (1978) 2 WLR 902;
(xx) McLeod v. St. Aubyn (1899 AC 549);
(xxi) Lucknow Development Authority v. M.K. Gupta, AIR 1994 SC 787;
(xxii) Luis Hens Serena v. Spain, 2008 SCC OnLine HRC 20;
(xxiii) Walmik Bobde v. State of Maharashtra, 2001 ALL MR (Cri.) 1731;
(xxiv) Bharat Devdan Salvi v. State of Maharashtra, 2016 SCC OnLine Bom 42;
(xxv) Mehmood Nayyar Azam v. State of Chhattisgarh, (2012) 8 SCC 1, Sanjeevani V/S State MANU/MH/0469/2021
(xxvi) Veena Sippy V/S Mr. Narayan Dumbre 2012 SCC OnLine Bom 339
(xxvii) M. Ramesh v. Govt. of T.N., 2021 SCC OnLine Mad 5068.
(xxviii) Nachhattar Singh alias Khanda Vs State 2009(4)RCR(Criminal)409, 2010(4)SLR220
(xxix) Raman Lal v. State of Rajasthan, 2000 SCC OnLine Raj 226,
(xxx) Hari Das v. State of W.B., (1964) 7 SCR 237;
(xxxi) Perumal v. Janaki, (2014) 5 SCC 377;
(xxxii) State of Maharashtra v. Mangesh, 2020 SCC OnLine Bom 672.
(xxxiii) Arnab Ranjan Goswami v. Maharashtra State Legislative Assembly, 2020 SCC OnLine SC 1100,
(xxxiv) H. Syama Sundara Rao v. Union of India, 2006 SCC OnLine Del 1392.
(xxxv)
(xxxvi) Re: C. S. Karnan (2017) 7 SCC 1;
(xxxvii) In , R. C. Pollard vs Satya Gopal Mazumdar 1943 SCC OnLine Cal 153;
(xxxviii) K. C. Chandy Vs. R.Balakrishna Pillai, AIR 1986 Ker 116,
(xxxix) Baradakant Mishra Vs. Registrar of Orissa High Court (1973) 1 SCC 374;
(xl) Govind Mehta Vs. State of Bihar (1971) 3 SCC 329,
(xli) K. Rama Reddy Vs State 1998 (3) ALD 305,
(xlii) Jagat Jagdishchandra Patel Vs. State of Gujrat 2016 SCC OnLine Guj 4517;
(xliii) Muzaffar Husain vs. State 2022 SCC OnLine SC 567.
(xliv) S.P. Gupta v. Union of India, 1981 Supp SCC 87;
(xlv) R.R. Parekh Vs. High Court of Gujrat (2016) 14 SCC 1,
(xlvi) Umesh Chandra Vs State of Uttar Pradesh & Ors. 2006 (5) AWC 4519 ALL;
(xlvii) State Bank of Travancore V/s. Mathew K.C., (2018) 3 SCC 85,
(xlviii) Prem Kaur Vs. State (2013) 14 SCC 653 ;
(xlix) Vijay Shekhar v. Union of India, (2004) 4 SCC 666,
(l) Sama Aruna v. State of Telangana, (2018) 12 SCC 150;
(li) Manohar Lal v. Ugrasen, (2010) 11 SCC 557;
(lii) Prem Kaur Vs. State (2013) 14 SCC 653;
(liii) Kamisetty Pedda Venkata Subbamma v. Chinna Kummagandla Venkataiah, 2004 SCC OnLine AP 1009;
(liv) S. Nambi Narayanan v. Siby Mathews, (2018) 10 SCC 804,
(lv) State of Maharashtra Vs. Kamlakar Bhavsar 2002 ALL MR (Cri) 2640
(lvi) Shameet Mukherjee v. C.B.I, 2003 SCC OnLine Del 821
(lvii) Sudhir Vora Vs. Commissioner of Police (2004 CRI. L.J.2278)
(lviii) Sarvepalli Radhakrishnan University v. Union of India, (2019) 14 SCC 761;
(lix) ABCD v. Union of India, (2020) 2 SCC 52; a
(lx) Sunder v. Union of India, (2001) 7 SCC 211.
(lxi) Badhuvan Kunhi Vs. K.M. Abdulla 2016 SCC OnLine Ker 2360.